कविता

न कहता है,इन चरणों को नित्य पखारूं…

निराकार बेडोल, यूं ही मिट्टी का ढेला।
फिरता यूं ही मूढ, जगत में रेला रेला॥

गर देकर के ज्ञान, ना तुमने तारा होता।
कच्चे घट जैसा, ना मुझे संवारा होता॥

मेरे नयनो को ना सत्य, जो आप दिखाते।
जाने किन छलचंदों में, ये नेह समाते॥

कर्म ज्योति का दीप जगाकर, मन में गुरुवर।
बता दिया क्या सत्य असत्य है, क्या है गिरधर॥

मानव मूल्य सिखा,भारी उपकार किया है।
मेरे जीवन को सचमुच, भव तार दिया है॥

गुरु दक्षिणा दे पाऊं, इस योग्य नही हूं।
तुमरी चरण धूलिका सम भी योग्य नही हूं॥

मन कहता है,इन चरणों को नित्य पखारूं।
कर वंदन नित, शीष झुकाऊं कर्ज उतारूं॥

सतीश बंसल

*सतीश बंसल

पिता का नाम : श्री श्री निवास बंसल जन्म स्थान : ग्राम- घिटौरा, जिला - बागपत (उत्तर प्रदेश) वर्तमान निवास : पंडितवाडी, देहरादून फोन : 09368463261 जन्म तिथि : 02-09-1968 : B.A 1990 CCS University Meerut (UP) लेखन : हिन्दी कविता एवं गीत प्रकाशित पुस्तकें : " गुनगुनांने लगीं खामोशियां" "चलो गुनगुनाएँ" , "कवि नही हूँ मैं", "संस्कार के दीप" एवं "रोशनी के लिए" विषय : सभी सामाजिक, राजनैतिक, सामयिक, बेटी बचाव, गौ हत्या, प्रकृति, पारिवारिक रिश्ते , आध्यात्मिक, देश भक्ति, वीर रस एवं प्रेम गीत.

2 thoughts on “न कहता है,इन चरणों को नित्य पखारूं…

  • shashisharma

    बहुत ही सुंदर बात कही आपने अपनी रचना में |
    गहन भाव |

    • सतीश बंसल

      आभार शशी जी…

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