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धार्मिक आयोजन के दौरान भगदड़

वैसे तो कहा जाता है कि सभी धर्म ईश्वर के द्वार तक पहुँचानेवाले अलग-अलग रास्ते हैं.
सभी धर्मों में अच्छी बातें ही बताई गयी हैं. व्याख्या करनेवाले अपने-अपने तरीके से व्याख्या करते हैं और उनमे भी अक्सर विवाद होते ही रहते हैं. सभी धर्मों में सदाचार, अहिंसा, आत्मशुद्धि, स्वच्छता, पवित्रता, भाईचारा, आपसी सदभाव, मेल-जोल का पूर्णत: ख्याल रक्खा गया है. पर कुछ हठधर्मिता, कुछ अन्धविश्वास, कुछ अंध-श्रधा हर धर्मों में एक हद तक विद्यमान हैं. हिन्दुओं के लिए मंदिर, मुस्लिमों के लिए मस्जिद, सिक्खों के लिए गुरुद्वारा, ईसाईयों के लिए गिरिजा घर पवित्र स्थान है जहाँ पर सामूहिक रूप से आराधना/प्रार्थना की जाती है. वैसे तो हर दिन पवित्र दिन है, पर कुछ मान्यता वश एक ख़ास दिन हर धर्म में होता है, जिस दिन सभी जन इकठ्ठा होकर प्रार्थना/आराधना करते हैं. इन्ही खास दिनों को पर्व त्योहार के रूप में मनाते हैं. जो लोग रोज प्रार्थना/आराधना नहीं कर सकते उस खास दिन को पूरी तैयारी के साथ, पूरे मनोयोग से अपने आपको समर्पण कर देते हैं.
मुस्लिमों की तीर्थ नगरी मक्का है, जहाँ दुनिया भर के मुसलमान जुटते हैं और वहां से हज कर लौटने पर अपने आपको धन्य समझते हैं. हज के साथ वहां शैतान को पत्थर मारने का एक रश्म होता है. इस कंकड़ मारने के दौरान भी काफी भीड़ होती है और लगभग हर साल छोटे बड़े हादसे होते ही हैं. इसी साल २४.०९.२०१५ को मक्का में हजयात्रा के बीच शैतान को कंकड़ मारने के दौरान बड़ी भगदड मच गई और इस हादसे में अधिकारिक रूप से 717 लोगों की मौत हो गई, जबकि 805 हाजी जख्मी हो गए हैं. इस साल 30 लाख से ज्यादा लोग हज करने गए थे. हालांकि,शैतान को जहां सांकेतिक कंकड़ी मारी जाती है उस जगह पहुंचने के लिए काफी चौड़े रास्ते के अलावा पांच मंजिला फ्वाइओवर भी बनाए गए हैं, लेकिन लाखों की भीड़ और हाजियों की जल्दबाज़ी से ये हादसा हो गया.
इसके अलावा और भी कई हादसे मक्का में हुए है कुछ आंकड़े – जुलाई, 1990 मक्का से मीना और अराफात की ओर जानेवाले पैदल यात्री के लिए बनी सुरंग अलमयी सिम में हादसा हुआ जिसमें 1426 लोग मारे गए थे. मई, 1994 में शैतान को कंकड़ी मारने के दौरान हादसा हुआ जिसमें 270 लोग मारे गए. अप्रैल, 1998 में हादसा भी जमेरात की पुल पर हुआ, जिस रास्ते से हाजी शैतान को पत्थर मारने के लिए जाते हैं. इस हादसे में 118 लोग मारे गए और 180 लोग जख्मी हो गए. मार्च, 2001 में भी शैतान को पत्थर मारने के दौरान हादसे में 35 लोग मारे गए. फरवरी 2003 में शैतान को पत्थर मारने के दौरान हुए हादसे ने 14 लोगों की जान ले ली थी. फरवरी 2004 में शैतान को पत्थर मारने के दौरान 251 हाजी मारे गए, जबकि 244 जख्मी हो गए. इससे पहले 11 सितंबर को जुमे की शाम मस्जिद-ए-हरम में हुए क्रेन हादसे में 107 लोग मारे गए थे. दरअसल ये हादसा इसलिए हुआ क्योंकि मस्जिद के विस्तार का काम चल रहा है और भारी बारिश के बाद लाल रंग की बड़ी सी क्रेन मस्जिद की दीवारें तोड़ती हुई जमीन पर आ गिरी जिससे 100 से ज्यादा लोग मारे गए. मस्जिद के जिस हिस्से में ये हादसा हुआ था वहां करीब एक हज़ार लोग मौजूद थे.

भारत में भी बड़े धार्मिक आयोजन के दौरान भगदड़ की घटनाएं अक्सर होती रही हैं.
आइये कुछ आंकडे देखते हैं, जो अंतर्जाल से लिए गए हैं.
1986 – हरिद्वार में एक धार्मिक आयोजन के दौरान भगदड़ में 50 लोगों की मौत हो गई.
१४ जनवरी २०१० में गंगा सागर में भगदड़ हुई थी और उसमे सात तीर्थ यात्री मारे गए थे और अनेकों घायल भी हुए थे.
08-11-2011 – हरिद्वार में हुई एक भगदड़ के दौरान कम से कम 16 लोग मारे गए और 40 जख्मी हुए. गंगा के किनारे शांतिकुंज आश्रम के एक आयोजन के दौरान मुख्य समारोह स्थल के एक गेट पर भगदड़ मची.… भगदड़ उस समय हुई जब कुछ श्रद्धालुओं ने गायत्री परिवार के धार्मिक अनुष्ठान में हिस्सा लेने की जल्दी की.
14-01-2012 – मध्य प्रदेश के रतलाम में शहीदे कर्बला के 40 वें दिन हुए धार्मिक आयोजन के दौरान अचानक भगदड़ मच गई। इस भगदड़ में बारह लोगों की मौत हो गई और कई अन्य जख्मी हो गए।
20-02-2012 – गुजरात में भगदड़, 6 लोगों की मौत गुजरात के जूनागढ़ में आयोजित शिवरात्रि मेले में रविवार रात हुई
24-09-2012 … देवघर में अनुकूल चन्द्र ठाकुर की 125वीं जयंती पर सत्संग आश्रम में आयोजित समारोह में भगदड़ मे कम से कम 9 यात्रियों की मृत्यु और अनेक के घायल होने की घटना
11-02-2013 – बारह वर्षों में होनेवाले कुंभ मेले में रविवार को मौनी अमावस्या के दिन इलाहाबाद के रेलवे स्टे़शन पर भगदड़ मच जाने से लगभग 36 लोगों की मौत हो गयी।
०३.१०.२०१४ – बिहार की राजधानी पटना में रावण दहन के बाद भगदड़ में मरनेवालों की अधिकारिक संख्या 3४ बतायी गयी .
80 के दशक में जमशेदपुर में भी विजयादशमी के दिन भगदड़ मची थी और कई लोग मारे गए थे. उसके बाद जमशेदपुर में भगदड़ का इतिहास नहीं है.यहाँ के प्रशासन और अनुशासित नागरिकों ने भी सबक ले लिया.
इसी साल सावन के महीने में १० अगस्त २०१५ को देवघर में भी भगदड़ मची थी, उसमे भी ११ लोग मारे गए तथा दर्जनों घायल हुए थे.
दिक्कत यह है कि ऐसी घटनाएं होने के बाद भी न धार्मिक आयोजनों के आयोजक और नही स्थानीय प्रशासन सावधान रहता है। कम ही धार्मिक प्रतिष्ठान हैं, जो आमलोगों की सुविधा और सुरक्षा के नजरिये से योजनाबद्ध तरीके से आयोजन करते हों।
ज्यादातर जगहों पर आने-जाने के मार्ग इतने संकरे होते हैं कि भगदड़ होने पर लोगों के कुचले जाने का खतरा होता है। ज्यादातर मंदिरों या अन्य धार्मिक प्रतिष्ठानों का निर्माण तब हुआ था, जब देश की आबादी इतनी नहीं थी और यातायात के साधन भी सुगम नहीं थे। अब तो दूरदराज के मंदिरों में भी आसानी से लाखों लोग पहुंच जाते हैं। कई मंदिरों में पहले कुछ विशेष अवसरों पर ही थोड़ी-बहुत भीड़ होती थी, अब रोज वहां मीलों लंबी लाइनें देखने को मिलती हैं। हमारा आम रवैया यह होता है कि जबतक दुर्घटना नहीं हो जाती, तबतक कुछ नहीं करते और अगर दुर्घटना हो जाती है, तो दूसरों पर जिम्मेदारी डाल देते हैं। अब संचार और यातायात की सुविधा की वजह से लाखों लोगों का किसी आयोजन में इकट्ठा होना कोई मुश्किल नहीं है, इसलिए सुरक्षा के मामले में लापरवाही का रवैया चल नहीं सकता और यह बात सिर्फ आयोजकों को नहीं, वहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को भी समझनी होगी। कोई नहीं चाहता कि श्रद्धा से की गई तीर्थयात्रा किसी के लिए मृत्यु का कारण बने, लेकिन धार्मिक आयोजन तभी सुरक्षित होंगे, जब आयोजक और श्रद्धालु, दोनों व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखने की अपनी जिम्मेदारी को समझें।
आजकल अन्धानुकरण भी काफी बढ़ गया है, सभी लोग इन धार्मिक आयोजनों में शामिल होकर अपने पाप धो डालना चाहते हैं या पुण्य कमाकर सीधे स्वर्ग जाने की कामना रखते हैं. इसमे किसी को भी जरा सा धैर्य नहीं होता. आखिर हम सब विकसित होकर क्या सीख रहे हैं. आस्था होना अलग बात है और अन्धानुकरण अलग. हमें इनमे फर्क करना सीखना होगा. खासकर इन दुर्घटनाओं में बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं ही ज्यादा हताहत होते हैं कम से कम उन्हें तो इस भीड़-भाड़ से बचाए जाने की कोशिश की जानी चाहिए.
– जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

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