उपन्यास अंश

आजादी भाग –३३

पुलिस की जीप तीव्र गति से रामनगर की तरफ दौड़ी जा रही थी । ड्राईवर काफी मुस्तैदी से गाडी चला रहा था लेकिन विनोद को ऐसा लग रहा था जैसे वह बहुत ही नाकारा चालक हो । गाड़ी नहीं बैलगाड़ी चला रहा हो । उसका मन कर रहा था ‘ ,काश ! उसके पंख होते तो वह कब का अपनी मर्जी से वहां रामनगर पहुँच गया होता । और थोड़ी ही देर में पूरा रामनगर छान लिया होता । कहीं न कहीं राहुल अवश्य उसे मिल जाता । बहरहाल समय अपनी चाल से चलता रहा और पुलिस की गाड़ी आंधी तूफान की गति से अपनी मंजिल की तरफ अग्रसर होती रही ।

कमाल को गाड़ी चलाते हुए लगभग एक घंटे से अधिक का समय हो चुका था । मुनीर ने कलाई पर बंधी घडी देखी । पांच बजे से कुछ अधिक का समय हो चुका था । बाहर अच्छी खासी धूप बिखरी हुई थी । गाड़ी के हिचकोले खाना बंद होते ही राहुल और उसके साथियों ने अंदाजा लगा लिया था कि गाड़ी अब मुख्य सड़क पर आ गयी है । लगभग पांच मिनट के इंतजार के बाद राहुल ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं और अपने आसपास का जायजा लिया । सभी बच्चे एक दूसरे से चिपके हुए बेसुध से दिखलाई पड़ रहे थे । उनकी स्थिति देखकर न चाहते हुए भी राहुल की हंसी निकल गयी लेकिन उसने तुरंत ही अपने हाथों को मुंह से ढंक कर हंसी को ख़ामोशी का जामा पहना दिया । उसके हंसने की वजह थी मनोज की लम्बी टांगें टीपू की कमर पर से गुजरती हुयी बंटी के नथुने को छू रही थीं जबकि उसके खुद के चेहरे पर एक दूसरे बच्चे का पैर अपना कब्ज़ा किये हुए था । ऐसी स्थिति में भी सभी बेसुध बने रहने का शानदार अभिनय कर रहे थे । मुस्कुराते हुए राहुल के मन में सभी बच्चों के लिए प्रशंसा के भाव पैदा हो गए थे । अपने मुंह पर पड़ी टांगों को धीरे से परे सरकाते हुए राहुल उठ बैठा । टेम्पो में उसे अब सब कुछ साफ़ नजर आ रहा था । अपने हाथों पर एक उंगली रखकर खामोश रहने का संकेत देते हुए राहुल ने एक एक कर सभी बच्चों को सावधानी से बिना किसी आहट के धीरे से उठकर बैठ जाने का इशारा किया । सभी बच्चों ने पूरी मुस्तैदी दिखाई और बिना किसी हलचल के बड़ी सावधानी से उठकर बैठ गए । इस दौरान राहुल बराबर अपने मुंह पर एक उंगली रखे सबको खामोश रहने का निर्देश देता रहा । गाड़ी की तेज गति और उसकी आवाज तथा स्पंदन की वजह से गाड़ी के पिछले हिस्से में घट रही घटनाओं से अनभिज्ञ कमाल निरंतर गाड़ी भगाए जा रहा था । उसके दिमाग में कालू की कही एक ही बात बार बार गूंज रही थी ‘ किसी भी हालत में सात बजे से पहले रामनगर के चौराहे पर पड़ने वाले चेक पोस्ट से शहर के अन्दर दाखिल हो जाना है ‘  ।
दोपहर में आराम का तलबगार कमाल अब सुस्ती महसूस कर रहा था । बार बार उसकी पलकें झपक रही थी फिर भी कालू भाई की चेतावनी के मद्देनजर लगातार गाडी चलाते रहना उसके लिए जरुरी था । हालाँकि यह कोई मुश्किल काम नहीं था । दो घंटे के रास्ते में से वह लगभग आधी दूरी तय कर चुका था  और बस अगले एक घंटे के सफ़र के बाद ही वह अपने अड्डे पर पहुँच जाने वाला था । कमाल की पलकें झपकते ही गाड़ी चलते चलते लहरा जाती जिसे मुनीर ने भी ताड़ लिया था और कमाल से बोला ” अमां यार कमाल भाई ! क्यूँ इतना खतरा उठाये जा रहा है ? नींद आ रही हो तो किसी ढाबे पे लगा के गाडी चाय वाय पी लेते हैं । थोड़ी देर के लिए नींद और सुस्ती दोनों गायब हो जाएगी । ”
सड़क पर नजरें जमाये हुए ही कमाल ने मुनीर को समझाते हुए ही बोला था ” तू तो बेकार में ही डर रहा है । मेरे ऊपर तुझे भरोसा नहीं है क्या ? अरे ! कुछ होगा तो मैं क्या गाड़ी से अलग हूँ ? मेरी जान को खतरा नहीं है ? अब बकवास बंद कर और चुपचाप गाने का मजा ले ” कहते हुए कमाल ने गाडी में लगा म्यूजिक सिस्टम चालू कर दिया । गाडी में गूंज रहे इंजिन के शोर के बिच खरखराते सिस्टम से संगीत की स्वर लहरी गूंज उठी ….परदेसी …परदेसी .. जाना नहीं ……..
मुनीर ने वॉल्यूम और बढ़ाते हुए कमाल से बोला ” ये तो तुमने बहुत ही बढ़िया किया । क्या गाना है और वो इसका हीरो है न ! क्या नाम है उसका ? ” खुद के माथे पर हलकी सी चपत लगाते हुए बोला ” अरे ! आपुन तो इसका बहुत बड़ा फेन है । साला आपुन को इसका नाम ही याद नहीं रहता है । हाँ ! याद आया । आमिर खान !एक बात तुमको बोलूं कमाल भाई ! ये जो साला हीरो है न ! अरे वही अभी क्या नाम बोला था ? हाँ ! आमिर खान ! अपना दूर का रिश्तेदार है । ”
गाड़ी चलाते हुए कमाल उसकी बात सुनकर एक बार तो चौंक गया । थोड़े समय के लिए गाड़ी लहराई लेकिन तुरंत ही उसपर काबू पाते हुए कमाल ने उसको  बिच में ही टोकते हुए बोला ” अबे ! तू क्या बोल रहा है तुझे पता है ? अपनी शकल भी देखी है आईने में ? ” फिर बुरा सा मुंह बनाते हुए बोला ” तू तो ऐसे बोल रहा है जैसे वो बोलते हैं न .. कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली .. उसके यहाँ तो तेरे जैसे को वाचमैन की नौकरी भी नहीं मिले और बात करता है रिश्तेदारी की  । चल बस कर फेंकना …  । ”
मुनीर भी कहाँ हार मानने वाला था । जवाब तो जैसे उसके पास हाजिर ही था ” कमाल भाई ! तुमको मानने का है तो ठीक नहीं तो कोई बात नहीं ! वो क्या हैं कि हम लोग गरीबी में ही खुश हैं । अपना मेहनत करके कमा खा रहे हैं उसके आगे क्यों हाथ फैलाना ? आखिर हमारी भी कोई इज्जत है ?  किसी दिन ……..”
उसकी आगे की बात अधूरी ही रह गयी और डर के मारे उसकी घिग्घी बंध गयी थी लेकिन अगले ही पल उसने राहत की सांस ली और ऊपर देखते हुए बोल पड़ा ” या खुदा ! तेरा लाख लाख शुक्र है । हम बच गए । ”
दरअसल गाड़ी चलाते हुए ही कमाल का ध्यान थोडा सा सामने से हट गया था जिसकी वजह से सामने से गलत दिशा में आ रही गाड़ी पर उसकी नजर नहीं गयी थी । वो तो अच्छा हुआ ऐन वक्त पर कमाल की नजर उस गाडी पर गयी और उसने बड़ी ही कुशलता से गाड़ी को बाएं मोड़ते हुए उस गाडी से टकराने से बचा लिया था । यद्यपि गलती सरासर सामने से आ रही गाड़ीवाले की थी लेकिन सड़क वह जगह है जहां आपको सुरक्षित रहने के लिए खुद तो गलती से बचना ही पड़ता है दूसरों की गलतियों से बचने के लिए भी सावधान रहना पड़ता है । अब एक बार फिर गाड़ी सरपट राम नगर की तरफ भागी जा रही थी । कमाल भी अब कुछ विचलित सा नजर आ रहा था । कमाल ने म्यूजिक भी बंद कर दिया था । गाड़ी में अब थोड़े समय के लिए ख़ामोशी छा गयी थी । संभावित दुर्घटना की आशंका मात्र  ने दोनों को झकझोर दिया था ।
दूर से ही ‘ राम भरोसे ढाबा ‘ का बोर्ड देखकर कमाल ने गाडी की गति कम कर दी और ढाबे के आते ही उसने गाडी सड़क से हटाकर ढाबे के बाहर बड़े से मैदान में खड़ी कर दी । गाडी खड़ी करके कमाल तो उतर कर सीधे ढाबे की तरफ बढ़ गया था जबकि मुनीर उतर कर गाड़ी के टायरों को देखते हुए गाड़ी का एक पूरा चक्कर लगाकर ढाबे की तरफ बढ़ा ।

क्रमशः

*राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।