कविता

अनंत यात्रा

समुद्र और उसकी लहरों का                                                       23.12.93
कोई पारावार नहीं
उनकी महिमा-गरिमा का
कोई जवाब नहीं.

सागर-तट से मिलने को आतुर
सगर-तट के आकर्षण से बंधी चली आई
मीलों लम्बी लहर
जो
कई हिस्सों में विभक्त हो चुकी होती है
के दोनों सिरे
आपस में मिलने को आतुर होते हैं
कभी-कभी
जब वे मिल जाते हैं
तो उनके हर्ष की सीमा नहीं होती
कभी
वे न मिल पाएं
तो अत्यंत गंभीरतापूर्वक
संतुष्टि से
वे दोनों
अपने अस्तित्व को
अपने जन्मदाता सिंधु में
शांतिपूर्ण विलीन करके
पुनः
अनंत यात्रा पर निकल पड़ती हैं.

इस अनंत यात्रा में
कभी वे
उगते सूर्य को नमन करती हैं
और
छिपते-से चंद्रमा को विदाई देती हैं
कभी
अस्तांचल को जाते हुए सूर्य के
दर्शन हेतु स्थिर हो जाती हैं
फिर
थोड़ी देर बाद
आने वाले चंद्रमा का
अभिनंदन करती हैं
कभी-कभी
चपल बालिकाओं की भांति
तारक-बाल-समूह से
अठखेलियां करती हुई
अनंत यात्रा का
अनंत आनंद लेती हैं.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244