कविता

स्वर्णिम आभा

सागर के उर पर
उगते सूरज की
नैसर्गिक स्वर्णिम आभा से
जो
स्वर्णिम पटल
निर्मित होता है
वह अनुपम है
मानो
सागर के ऊपर और अंदर
मीलों तक
सुनहरी कालीन बिछा हो
या कि
अंबर के लाखों सितारे
भास्कर देवता के स्वागत में
धरा पर बिछ गए हों
अथवा
अगणित सोने के फूल खिले हों
किंवा
धरती और अम्बर के बीच
सुनहरी हिंडोला लग गया हो
जिसमें
बाल सूर्य
अत्यंत उमंगपूर्वक झूल रहा हो
कुछ ही क्षणों में
यह स्वर्णिम आभा
आभास के रूप में
परिवर्तित हो जाती है
और फिर
अनंत में विलीन हो
अनंत बन जाती है.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244