सामाजिक

पाखंड को जेल

“पाखंड केो जेेल”

शायद ही किसी धर्म की सीमा पाखंडियों के चंगुल से सुरक्षित बची हो। खूब आक्रमण हो रहा है अपने ही विश्वास को खंडित करने के लिए, और धर्म के पहरेदार/ अनुयायी, अपना सब कुछ उस पाखंडी को अर्पण करने के लिए खुद को जैसे चाहो लूट लो का करारनामा लिए हुए, श्रद्धा, भक्ति और समर्पण का जज्बा लिए हुए कतार में खड़ें है। मानों इंतजार कर रहें हैं कि अभी मेरे सर्व सक्षम गुरु दर्शन देकर दुख, बीमारी और अभिशाप से मुक्त कर देंगे और धन धान्य व पैसे की तिजोरी हमारे घर में छलछला जाएगी एवं हम अमरत्व की संजीवनी से नहा जाएंगे। छलावा दर छलावा का दर्शन खूब हो रहा है फिर भी सम्मोहन इतना बलशाली हो रहा है कि लोग उससे बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। प्रकृति को पूजने वाला देश आज व्यक्ति विशेष की पूजा में लिपटा हुआ है। भगवान और भावना दोनों से बिमुख हो रहा मानव आज चमत्कार को नमस्कार कर रहा है। अर्थ और विलासिता के लिए अंधी दौड़ हमे प्रतिपल प्रताड़ित कर रही है फिर भी हम नामुराद उम्मीद पर भरोषा कर रहे हैं।
और तो और पढ़े लिखे हमारे झिनकू भैया भी एक लमेरा गुरु के चक्कर में भस्मीभूत हुए जा रहे हैं। हर त्योहार पर उनकी सुबह शाम गुरु कुटिया पर आफरीन है। जो कुटिया आज तक अपने ही उत्थान में न जाने कहाँ कहाँ से पधारे हुए भक्तों के हार माला से मालामाल होते जा रही है और गुरु जी का सिंघासन सप्त रंगी रंग में चमकता जा रहा है। झिनकू भैया की जमा पूंजी का चढ़ावा शायद कम पड़ रहा है अब जमीन पर नजर लग गई है, अब तब हुई है। जल्दी ही कुटिया पर दो कमरा झिनकू भैया के नाम के साथ झलक जाएगी और दानवीर हमारे भैया, चेला बनकर मंत्रधारी सेवक हो जाएंगे। अमूमन यही दशा हर पांखडी गुरुओं की है जो आम जन का खून चूसकर अपना साम्राज्य बढ़ा रहे हैं और कानून के दखल पर जेल जा रहे है। कब तक हम अपना घर जलाकर मठों की रोशनी करेंगे, यह अति विचारणीय प्रश्न है जो रोशनी हमारी सम्पति, हमारे देश, हमारे अपनों को जला रही है उसमें हम अपनी श्रद्धा का घी कैसे गिराएंगे और क्यों जलाएंगे वह दीपक जो हमारे अस्मिता को तार तार कर रहा है। जय हिंद……..!

आधार छंद-दोहा (अर्द्ध सम मात्रिक) समान्त- ऊत, अपदांत

“दोहा मुक्तक”

सच्चाई दिखती नहीं, डेरा तेरा भूत।
राम रहीम के नाम पर, यह कैसी करतूत।
ढोंगी की विसात यही, खुली आँख से देख-
तार तार तेरा हुआ, रे पाखंडी सूत।।-1

सच्चा सौदा नाम का, तक मंशा फलिभूत।
धर्म तुला की राक्षशी, फलती जस सहतूत।
गाल फुलाकर नाचते, मानो हो नटराज-
गुनो जेल में कैद हो, शिष्य तके नहिं पूत।।-2

महातम मिश्र ‘गौतम’ गोरखपुरी

*महातम मिश्र

शीर्षक- महातम मिश्रा के मन की आवाज जन्म तारीख- नौ दिसंबर उन्नीस सौ अट्ठावन जन्म भूमी- ग्राम- भरसी, गोरखपुर, उ.प्र. हाल- अहमदाबाद में भारत सरकार में सेवारत हूँ