गीत/नवगीत

बचपन

 

बहुत नाचे ,बहुत खेले
वो कांटे भी बहुत झेले
वो सरसों का खेत पिला
अब मुझे बुलाता है
वो बचपन का था इतराना
मुझे अब याद आता है

सभी की बात होती थी
गजब की रात होती थी
ढूंढा करते थे सब जुगनूँ
महफिलें आबाद होती थी
यह दिलकश नजारा ही
मुझे गांव में खींच लाता है
वो बचपन का था इतराना
मुझे अब याद आता है

सभी बैठकर साथ खाते थे
बड़ा ही उधम मचाते थे
कोई जानता रागिनी 2
किसी से पांच गवाते थे
वह मटका जो टीप बांधे
मुझे अब भी बहुत भाता है
वो बचपन का था इतराना
मुझे अब याद आता है

 

प्रवीण माटी

नाम -प्रवीण माटी गाँव- नौरंगाबाद डाकघर-बामला,भिवानी 127021 हरियाणा मकान नं-100 9873845733