लेख – विरोध

विरोध भी बंधन का एक प्रकार है। आप जिस भी वस्तु या व्यक्ति का विरोध करते हैं जाने-अनजाने स्वयं को उसके साथ बाँध लेते हैं। बंधन तो बंधन ही है प्रेम का हो या नफरत का। हम या तो भोग में लिप्त रहते हैं या विरोध में। दोनों ही स्थितियां अति की हैं। हमें ना तो भोग करना है ना विरोध, हमें तो बस बोध करना है। जिस भी अवस्था का बोध होता जाए व्यक्ति उससे बंधनमुक्त हो जाता है। संसार में कोई भी वस्तु अनावश्यक नहीं है ना ही समूल रूप में अच्छी या बुरी है। भेद केवल मात्रा का है। अल्प मात्रा में विष भी कहीं दवा का कार्य कर जाता है और अत्याधिक मात्रा में दवा भी विष हो जाती है। परमेश्वर ने कोई भी वस्तु ऐसी नहीं बनाई जो संपूर्ण रूप से अनावश्यक हो। यदि हम किसी भी वस्तु या व्यक्ति का विरोध करते हैं तो वास्तव में हम उस सर्वशक्तिमान का ही विरोध कर रहे हैं क्योंकि अगर किसी भी रचना में त्रुटि है तो दोष रचना का नहीं रचनाकार का है। जीवन में घटने वाली प्रत्येक घटना या मिलने वाला प्रत्येक व्यक्ति हमें कोई ना कोई बोध देने के लिए है। उचित यही है कि हम अपने पूर्वाग्रहों का बोझ उतार कर उसे सम्यक दृष्टि से देखें एवं उससे कुछ बोध लेने का प्रयत्न करें।

— भरत मल्होत्रा