प्रतीक्षा

आज सुबह-सुबह अखबार की सुर्खी देख अनुषा के पापा के जहां एक ओर गर्व हो रहा था, वहीं पिछले साल अपने किए पर पछतावा भी हो रहा था. अखबार की सुर्ख़ी थी-
”अनुषा ने कामयाबी की एक नई मिसाल पेश की” 
उन्हें वह दिन याद आ रहा था, जब अनुषा रो-रोकर शादी न करने की दुहाई दे रही थी. 
”पापा, अभी मैं बहुत छोटी हूं, मेरी उम्र शादी के लायक नहीं है, प्लीज़ मेरी शादी मत कीजिए.” अनुषा ने दुःखी मन से बहुत अनुनयपूर्वक कहा था.
”चुप रह छोकरी, सुनती हो भागवान, बेटी को समझा दो, मेरा सिर न खाए. मुझे इसके ब्याह के लिए बहुत-से काम करने हैं.”
”ठीक तो कह रही है बेटी, आप मानते क्यों नहीं? इस उम्र में शादी करने से उसकी जान पर भी आफत आ सकती है.”
”अब तुम अपनी नसीहत अपने पास रखो. तुम्हारी शादी भी तो इसी उम्र में हुई थी, फिर क्या आफत आई?”
”तब से अब तक आफत में ही तो दिन बीत रहे हैं. आए दिन अस्पताल के चक्कर ही लगाते रहो.”
”अब तुम दोनों मेरी नजरों के सामने से दूर हो जाओ, वरना मेरा हाथ उठ जाएगा.” 
उनका हाथ कई बार उठ भी चुका था. वक्त रहते चाइल्ड लाइन और पुलिस की मदद से अनुषा की शादी को रोक न लिया गया होता, तो वह भी अपनी मां की तरह अनपढ़ ही रह जाती और रग्बी राष्ट्रीय टीम के लिए खेलकर कामयाबी की एक नई मिसाल पेश करने की सुर्ख़ी का आना भी नामुमकिन था. तभी पत्रकारों की टीम की घंटी से उनकी तंद्रा टूटी. थोड़ी देर में अनुषा पत्रकारों को संबोधित करते हुए कह रही थी-
”मैं 10वीं कक्षा में थी तभी मुझे मेरी शादी से ठीक 10 दिनों पहले चाइल्ड लाइन और पुलिस ने बचाया. मैं अब 11वीं कक्षा में हूं. मैं 9वीं कक्षा से ट्रेनिंग ले रही हूं और अंडर-19 के लिए खेल चुकी हूं. अब मैं रग्बी राष्ट्रीय टीम के लिए खेल रही हूं. मैं अंतर्राष्ट्रीय लेवल तक खेलना चाहती हूं. अभी मुझे असली मुकाम की प्रतीक्षा है.”

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।