कविता

पाठशाला

छटपटाहट देखी
सरकारी चोरों की
कहने को अध्यापक कहलाते
गरिबों का आटा तक खा जाते
अध्यापन मात्र एक स्वप्न यहाँ
फुला बैठा भ्रष्टाचार का सर्प जहाँ

क्यों शिक्षा से गरिब
आज भी वंचित है?
क्या यही मेरा हिंदुस्तान
ऐसे ही अद्भुत है ?
क्यों शिक्षा के स्तर
को बाँट रखा है?
कौन-कौन आगे बढेगा
ये सब छाँट रखा है!

क्यों इन्हें अनाज देकर
आश्रित बनाया जा रहा है?
क्यों शिक्षा के मंदिर में
भेदभाव का तम छा रहा है?
इन धन्नासेठों को
इनकी आत्मा क्यों नहीं कोसती?
क्यों सरकारे आज तक
इनकी थालियाँ हैं परोसती?
द्वंद है मन में
दूर तक फैली ज्वाला है
व्यवस्था को देखकर
लहु बरसता है आंखों में
लगा दूँ आग!! या पी लूँ
सब्र का जो रखा प्याला है

आत्मा तुम्हारी दुत्कारेगी
उपरवाले के सामने
क्या जवाब दोगे?
यूं बरबाद करके भविष्य हिंद का
क्या चैन से रह लोगे?

मैं हिसाब माँगूगा!
मैं जवाब माँगूगा!

 

प्रवीण माटी

नाम -प्रवीण माटी गाँव- नौरंगाबाद डाकघर-बामला,भिवानी 127021 हरियाणा मकान नं-100 9873845733