”मैं माया हूं”

”मैं माया हूं.”
”अकेली तुम ही माया नहीं हो, इस संसार में हर जड़-चेतन सब माया-ही-माया हैं, जिसके चक्कर में हम सब फंसे ही रहते हैं.”
”फिर भी मैं कह रही हूं, कि मैं माया हूं. सुनोगे मेरी कहानी?”
”तुम अपनी कहानी सुनाना चाहती हो? सुनाओ.”
”मैं 8 साल की हूं. मेरा पूरा नाम माया मरही है. मैं सीरिया के एक रिफ्यूजी कैंप में रहती हूं. मैं जन्म से ही बिना पैर के पैदा हुई थी, लेकिन कैंप में आने-जाने के लिए मैं टीन केन से बने पैरों का प्रयोग करती थी. मेरी इस तस्वीर ने दुनिया को झकझोर दिया था. मेरे पिता मोहम्मद अली मरही भी जन्म से ही बिना पैरों के ही हैं. मेरा परिवार सीरिया के कैंप में रहने को मजबूर था और मेरे पिता के पास नकली पैर लगाने के लिए पैसे नहीं थे. मेरी टीन के पैरों से चलने वाली तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय एजेंसी एएफपी में प्रकाशित हुई थीं. सीरिया के रिफ्यूजी कैंप में अमानवीय हालत में रहने को मजबूर मेरी तस्वीर देख मदद के लिए हाथ बढ़े. मेरी और मेरे पिता की तस्वीरें वायरल होने के बाद तुर्की के डॉक्टरों ने हमारी मदद करने का फैसला किया. हम दोनों को इलाज के लिए इस्तांबुल लाया गया, जहां मुझे कृत्रिम पैर लगाने का काम डॉक्टर मेहमत जकी कुलकू ने किया. डॉक्टरों का कहना है कि कृत्रिम पैर लगाने के बाद तीन महीने में मैं पूरी तरह से कृत्रिम पैरों के सहारे चल सकूंगी.”
”माया, सच में तुम्हारी कहानी बहुत मार्मिक है. हम चाहते हैं, तुम भी हमारी तरह चल सको. हमारी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं.”

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।