हास्य व्यंग्य

खट्ठा-मीठा : नमाजवादी वैकुण्ठ वास

आज चलते-चलते मैं एक नमाजवादी से टकरा गया। वे बड़े प्रसन्न लग रहे थे। मैं चकराया कि टोंटीचोर का यह चमचा आज इतना खुश क्यों है? मैंने पूछ लिया- “कहिए नमाजवादी जी, आज इतने खुश क्यों हो?”
वे बोले- “आपको नहीं पता? भैया ने दिल खुश करने वाली घोषणा की है!”
“क्या?”
“वे विशाल विष्णु मन्दिर बनवायेंगे और वहाँ विष्णु नगरी बसायेंगे।”
“विष्णु नगरी यानी वैकुण्ठ ?”
“हाँ! हाँ! वही!” वे खुश होकर उछल पड़े।
“यानी वहाँ रहने वाले सब वैकुण्ठवासी कहलायेंगे?”
“हाँ…हाँ !” वे थोड़ा झेंप गये।
“उस नगरी में मुसलमान भी रहेंगे कि नहीं?” मैंने पूछा।
अब वे चकराये। न हाँ करते बनता था, न ना करते। किसी तरह बोले- “हमारा देश सेकूलर है, तो वे भी रहेंगे ही!”
“और रहेंगे तो वहां बकरीद भी मनायेंगे, बकरे भी काटेंगे, माँस भी बेचेंगे?”
उनकी प्रसन्नता हवा में गायब हो गयी। “आप तो बाल की खाल निकालते हैं!” कहकर वे चलते बने और मैं सोचता खड़ा रह गया।

बीजू ब्रजवासी
श्रावण शु १४, सं २०७५ वि (२४ अगस्त २०१८)

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