इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक

इसमें कोई दो राय नहीं कि शुरू से आज तक लोगों को पोस्ट ऑफिस की बचत योजनायें बैंक तथा अन्य बचत या निवेश की अपेक्षा ज्यादा भरोसा है. लोगों को विश्वास है कि पोस्ट ऑफिस में जमा धन नहीं डूबेगा, क्योंकि यह सरकार का अपना विभाग और उपक्रम है. हालाँकि पहले लोग टैक्स से बचत के लिए भी पोस्ट ऑफिस में बचत पर ज्यादा ध्यान देते थे. अब पोस्ट ऑफिस भी सारी जानकारी मांग रहा है और आधार और पैन से लिंक्ड होने पर टैक्स से बच नहीं सकते. यह बात आलग है कि पोस्ट ऑफिस की कई बचत योजनाओं में टैक्स में छूट की सुविधा है, इसलिए अभी भी पोस्ट ऑफिस पर भरोसा ज्यादा है, पर पोस्ट ऑफिस के कर्मचारियों का आज के कम्प्यूटर के युग में अपग्रेड न होना, पुराने यानी परंपरागत तरीके से काम करने के तरीके जनता को निराश करते हैं. डाकघरों में भी कम्यूटर लग गए हैं. हर काउंटर पर लिखा हुआ है- बहुउद्देशीय खिड़की… पर सभी खिड़की के काम बंटे हुए हैं. हर काम के लिए ख़ास आदमी है और उसका काम वही करेगा, दूसरा नहीं.

वैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने १ सितम्बर (शनिवार) को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक (आईपीपीबी) का उद्घाटन किया. पीएम मोदी ने इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक के उद्घाटन के बाद लोगों को संबोधित किया. पीएम मोदी ने कहा कि आज से देश में डाकिया डाक लाया के साथ-साथ डाकिया बैंक लाया के रूप में जाना जायेगा. उन्होंने कहा कि देश के 650 जिलों और 3250 डाकघरों में इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक की सुविधा शुरू हो रही है. आज इस पहल से हम बैंक को गांव और गरीब के दरवाजे पर लेकर जाने का काम आरंभ कर रहे हैं. उन्होंने इसे एक क्रांतिकारी कदम बताते हुए कहा कि देश की अर्थव्यवस्था में और सामाजिक व्यवस्था में बड़ा यह परिवर्तन लाने वाला है. 1 सितम्बर 2018 देश के इतिहास में एक नई और अभूतपूर्व व्यवस्था की शुरुआत होने के नाते याद किया जाएगा.
इस मौके पर पीएम मोदी ने डाकियों के पुराने दिनों को याद किया. उन्होंने कहा कि डाकिए के हाथ में पहले भाला रहता था, उसके उपर घुंघरु बंधा होता था, जिससे पता चलता था कि डाकिया आ गया और कोई चोर लुटेरा उन्हें परेशान नहीं करता था. उन्हें भी पता था कि वो डाकिया किसी गरीब मां के लिए मनीऑर्डर लाया होगा. देश में सरकारों के प्रति विश्वास डगमगाया होगा, लेकिन डाकियों के प्रति नहीं. पहले गांव का शायद कोई भी बुजुर्ग ऐसा नहीं होगा कि पूछता नहीं होगा कि डाकिया आया है. डाकिया आया कि नहीं आया इसके आधार पर हमारी सामाजिक व्यवस्था तय होती है. डाकियों के पत्रों में कितना प्यार था दुलार था, चिंताएं थीं. यह बात कुछ हद तक सत्य है पर आज डाकिये की लापरवाही साफ़ झलकती है. साधारण डाक की चिट्ठियों को पहुँचाने में लापरवाही और कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज पहुँचाने के एवज में बख्शीश की मांग करना आम बात है. बक्शीश ना देने पर फिर वही लापरवाही. आगे प्रधान मंत्री ने कहा कि मन की बात कार्यक्रम में हर महीने हजारों पत्र आते हैं, मुझे लगता है कि पत्र लिखने वाला मेरे सामने ही हैं. हम समय के साथ बदलने वाले लोग हैं. देश की मांग के अनुसार व्यवस्था विकसित करने के पक्ष में हैं. हमारी सरकार पुराने व्यवस्थाओं को छोड़ने वाली नहीं बल्कि उनको रिफॉर्म करने की इच्छुक रहती हैं. टेकनोलॉजी आने की वजह से पत्रों की जगह इमेल ने ले ली है. भारतीय डाक विभाग देश की वो व्यवस्था है, जिसके पास डेढ लाख विभाग है. जो देश को जन-जन से जुड़े हुए हैं. अब डाकिए के हाथ में स्मार्ट फोन है और एक डिजिटल मशीन भी है. आईपीवी में बचत खाते के साथ-साथ अपना काम चलाने के लिए चालू खाता भी खोल सकता है. दूसरे खातों में वो ट्रांसफर भी कर सकता है, इसके माध्यम से बिजली, फोन और दूसके बैंकों के साथ साझेदारी कर कर्ज भी दे पाएगा. उन्होंने कहा, सभी सेवाओं बैंक के काउंटर के अतिरिक्त घर आकर देने वाले हैं. आपने कितने पैसे जमा किए थे, कितना लेनदेन किया है ये सब डाकिया बता देगा. आपको अपना खाता नंबर याद रखने और पासवर्ड बताने की भी जरूरत नहीं होगी. इस नए बैंक में कुछ ही मिनट में खाता खुल जाएगा. इस बैंक में मेरा भी खाता खुल गया है. हमारी सरकार देश के बैंकों को गरीबों के दरवाजे पर लेकर आ गई है. पहले के सरकारों में ऐसा नहीं था. पीएम मोदी ने इस मौके पर कांग्रेस पर भी जमकर निशाना साधा.

वैसे कोई भी मौका हो प्रधान मंत्री विपक्ष यानी कांग्रेस की सरकारों पर दोषारोपण का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देते. उनके पास कुछ ऐसे आंकड़े होते हैं और उन्हें वे इस आत्मविश्वास के साथ पेश करते हैं कि श्रोता मंत्रमुघ्ध हो जाते हैं. उन्होंने कहा कि आजादी के बाद से 2008 तक आज तक हमारे देश के सभी बैंकों ने 18 लाख की राशि ही लोन के तौर पर दी थी. और 6 साल में यह राशि बढ़कर 52 लाख करोड़ हो गई. यानी जितना लोन देश के बैंकों ने आजादी के बाद दिया था उसका दोगुना लोन पिछली सरकार ने 6 साल में दे दिया. हमारे देश में टेकनोलॉजी तो अब आई पहले फोन बैंकिंग का चलन था. अगर नामदार फोन कर दें तो लोन मिल ही जाता था. बैंक वाले अरबों-खरबों का कर्ज देते थे. सारे नियम कानून को ताक पर रखा जाता था नामदारों के लिए. कांग्रेस ने देश को बहुत नुकसान पहुंचाया है. उस समय नामदारों के आशीर्वाद से ही बैंकों में नियुक्ति होती थी. जबकि यह परंपरा आज भी कायम है, जिसे हम नोट्बंदी के समय और अभीतक देख/महसूस कर रहे हैं. बड़े लोगों के लिए सब कानून ताकपर और साधारण और छोटे लोगों के साथ सब कानून लागू होने के बाद भी चढ़ावे के बिना शायद ही कोई काम हो पाता है. इससे सम्बंधित ख़बरें भी प्रकाशित होती रहती है.
बता दें कि आईपीपीबी की स्थापना केंद्र सरकार के वित्तीय समावेशन के लक्ष्य को तेजी से पाने के लिए की गई है. इसकी कल्पना आम आदमी के लिए एक सस्ते, भरोसेमंद और आसान पहुंच वाले बैंक के तौर पर की गई है. इस भुगतान बैंक में भारत सरकार की 100% हिस्सेदारी है. इस डाक विभाग के व्यापक नेटवर्क और तीन लाख से अधिक डाकियों और ग्रामीण डाक सेवकों का लाभ मिलेगा. देश के 1.55 लाख डाकघरों को 31 दिसंबर 2018 तक आईपीपीबी प्रणाली से जोड़ लिया जाएगा. आईपीपीबी अपने खाताधारकों को भुगतान बैंक के साथ-साथ चालू खाता, धन हस्तांतरण, प्रत्यक्ष धन अंतरण, बिलों के भुगतान इत्यादि की सेवाएं भी उपलब्ध कराएगा. देश भर में इसके एटीएम और माइक्रो एटीएम भी काम करेंगे. साथ ही मोबाइल बैंकिंग एप, एसएमएस और आईवीआर जैसी सुविधाओं के माध्यम से भी बैंकिंग सेवाएं लोगों तक पहुंचाएगा. इस हफ्ते की शुरूआत में मंत्रिमंडल ने आईपीपीबी के व्यय को बढ़ाकर 1,435 करोड़ रुपये करने की मंजूरी दे दी थी. ताकि आईपीपीबी इस क्षेत्र में पहले से मौजूद पेटीएम पेमेंट्स बैंक, एयरटेल पेमेंट्स बैंक इत्यादि से प्रतिस्पर्धा कर सके. जो शायद मेरे हिसाब से संभव नहीं है. जिओ नेटवर्क के आने के बाद बीएसएनएल वाले सड़क पर आ गए हैं, उसी प्रकार विभिन्न बैंकों और पेमेंट के माध्यमों के आ जाने के बाद IPPB का क्या हस्र होगा, यह समझना ज्यादा आवश्यक है.

अब बात धरातल की – बहुत सारे डाकघरों में बचत खाते का प्रावधान पहले से था. कई डाकघरों में एटीएम भी लगे हैं पर कितना काम करते हैं, यह भी जगजाहिर है. पोस्ट ऑफिस में कतारें वैसे ही लगती हैं. कोई भी डॉक्यूमेंट का सत्यापन में काफी समय लगता है. विभिन्न बचत योजनाओं की मैचुरिटी के बाद भुगतान लेने में अब भी सप्ताह से दस दिन कम से कम लग जाते हैं. अगर बीच में छुट्टियाँ हो गयीं तो १२-१५ दिन भी लग सकते हैं. जबकि बैंक सावधि जमा(FD), आदि का भुगतान उसी दिन कर देते हैं. डाकघरों के अधिकारियों और कर्मचारियों को यह सोचना होगा कि वह बैंकिंग सिस्टम एवं भुगतान की अन्य माध्यमों का मुकाबला कैसे कर पायेगी?

प्रधान मंत्री की घोषणा अपनी जगह है. उन्होंने बहुत सी घोषणाऍ की है. पर जबतक धरातल पर योजनायें नहीं उतरती आम आदमी संतुष्ट नहीं हो सकता. मैं खुद डाकघर की सेवाओं से असंतुष्ट हूँ. शिकायत प्रणाली का भी कोई खास असर नहीं होता है.

एक फेसबुक दर्शक हरेन्द्र नारायण की आवाज – आज इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक पर देश के चौकीदार को एक विडियो में देख रहा था. लगा कि अब वे डाकिया का रोल भी करेंगे. डाकिया का रोल अब पहले का नहीं रहा. पोस्ट औफिसों में डाकिए भी हफ्ते में दो दिन ही एक दो घंटे के लिए मिलते हैं. वे जरूरी कागज भी घर नहीं पहुंचाते. पटना शहर मे वे आधार कार्ड तक नहीं पहुंचाते, Not found लिखकर वापस कर देते हैं. वह भी BSNL ही है. कोई भी काम डाकघर में बिना रिश्वत के नहीं होता. गांव में लोग अब आधार से ई पेमेंट के पॉइंट पर ले रहे हैं. एयरटेल पहले से ही #पेमेंट बैंक का काम कर रहा है. नोटबंदी के शोर व बैंको मे अपने लोगों द्वारा किए करामातों ने हिला कर रख दिया है. जिस तकनीक के हवाई बातों से वे सरकार बनाए वही उनका चेहरे का नकाब उतार फेंकेगा. तकनीक आपका कभी दोस्त है तो कभी विपक्ष भी. बडे सावधानी से इस्तेमाल करें.

जो भी तकनीक विकसित हुई है उसका फायदा भी लोगों को मिलने लगा है, पर धोखाधरी भी बढ़ी है. हमें खुद के साथ अपने आस-पास के लोगों को भी शिक्षित करने की जरूरत है.

  • जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.