गीत/नवगीत

गुरू दक्षिणा कैसे चुकाऊँ

गुरू तुम्हारे प्यार का उपकार मैं कैसे चुकाऊँ |
ज्ञान के अनमोल धन का मोल मैं कैसे चुकाऊँ |
गुरु तुम्हारे – – – – – –

आपने लिखना सिखाया आपने पढ़ना सिखाया ,
ज़िन्दगी के रास्ते हर मोड़ पे चलना सिखाया |
आपके उपकार का यह ऋण भला कैसे चुकाऊँ |
गुरु तुम्हारे- – – – — –

क्या सही है क्या गलत है आपने हमको बताया |
झूँठ क्या है ? सत्य क्याहै ? भेद दोनो का बताया |
आपकी अनुपम कृपा का भार मैं कैसे चुकाऊँ |
गुरु तुम्हारे- – – – – – –

दीप हो तुम ज्ञान का मन का तमस तुमने मिटाया |
हर अंधेरा दूर करके राह को रौशन कराया |
प्रीत के उपहार की गुरु दक्षिणा कैसे चुकाऊँ |
गुरु तुम्हारे- – – – – – – –

बस बताये मार्ग पर तेरे चलूँ ऐसी कृपा हो |
सत्य पथ का अनुसरण हो कर्म में रत साधना हो |
आज फिर आशीष देदो मैं सफल जीवन बिताऊँ |
गुरु तुम्हारे- – – – – – – –

लाख आयें मुश्किलें मेरे कदम न लडखडाये |
चीर कर अंधियार को सुंदर सुनहरा प्रात लायें |
कोटि वंदनव ‘मृदुल’ स्वर आराधना के गीत गाऊँ |
गुरु तुम्हारे- – – – – – – — –
मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल “
लखनऊ (उत्तर प्रदेश )

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016