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गड़रिया और सिंह

शीघ्र प्रकाश्य पद्यकथा कृति बिना विचारे का फल से प्रकाशन हेतु

गड़रिया और सिंह

नदी किनारे हरा- भरा

जंगल एक स्थित था

अनेक पशु-पक्षी वहां थे

रोज जंगल में मंगल था

 

सारी दुनिया उपकार की

बच्चों सबसे कहता था

पास के गांव में स्थित

एक गड़रिया रहता था

 

सिंह राजा जंगल का

बड़े मजे से रहता था

गड़रिया भेड़ें चराता

भला सबका करता था

 

एक दिन जंगल में कहीं

कांटा आकर के पड़ा था

जंगल राज घूमने निकले

पंजे में उनके गड़ा था

 

बडी वेदना उनने पायी

पल-पल तड़प रहे थे

कोई आके निकाले कांटा

दिल में यह सोच रहे थे

 

तभी गड़रिया किसी काम

उस जंगल में था आया

देखा दूर से उसने सिंह

डर से कलेजा थर्राया

 

जिसके नाम अच्छे-अच्छे

भयभीत होकर हैं मरते

उससे भला गड़रिया जी

जंगल में क्यों न डरते

 

फिर भी गड़रिया सिंह की

हालत देखकर सकुचाया

समीप पहुंचा सिंह के ज्यों

उसको पूंछ हिलाता पाया

 

गड़रिया को समझते देर न

इसको पंजे में भारी पीड़ा

परोपकार मानव का धर्म

कष्ट हरना सच्ची क्रीड़ा

 

इसलिए गड़रिये ने तुरन्त

पंजे से कांटा निकाल दिया

ममता की मूर्ति मानव ने

हिंसक पशु संभाल लिया

 

बीता समय घटी घटना

सिंह और मानव भूल गए

गड़रिया की किस्मत फूटी

चोरी में पकड़े जेल गए

 

राजा के सामने पेश हुए

पिंजड़े में गया था डाला

जिसमें भूखे सिंह का था

उसको बनना था निवाला

 

पर आश्चर्य हुआ वहां पें

सिंह न उस पर झपटा

गड़रिये की गोद में बैठा

मानो गया हो डपटा

 

सच में पिंजड़े का सिंह

गड़रिये को पहचाना था

जंगल में जिसने पीड़ा हरी

वही है उसने जाना था

 

वनराज का व्यवहार देख

सबको अचम्भा हुआ भारी

राजा जोकि विद्वान था

समझ गया कहानी सारी

 

अब राजा ने आदेश दिया

इन दोनों को मुक्त करो

जंगलराज जंगल को भेजो

गड़रिया मंत्री नियुक्त करो

 

देखा बच्चो मानव ही न

पशु भी समझदार होते हैं

परोपकार कभी न भुलाते

चरणों में पड़कर सोते हैं

इसीलिए हे नन्हें -मुन्हों

सबके दुख अपने समझो

सिंह ही भले घायल मिले

गड़रिये सा बनकर बूझो

 

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