पढ़ाई की राह

सूर्या और त्रिशा बहुत खुश हैं. खुश क्यों नहीं होंगे? पढ़ाई करते-करते ई-वेस्ट इकट्ठा कर इन दोनों छात्रों ने बनाई 17,000 बच्चों की पढ़ाई की राह.
”सूर्या और त्रिशा, पढ़ाई के साथ आपने ये ई-वेस्ट इकट्ठा करने का क्या काम शुरु किया हुआ है? पढ़ाई में हर्ज नहीं होता?” अक्सर उनसे पूछा जाता है.
”पढ़ाई तो सभी छात्र करते हैं, पर जिन बच्चों को पढ़ाई की राह नहीं मिल पाती, उनके लिए भी तो हमें कुछ करना चाहिए न!”
”यह काम तो आप पढ़ाई के बाद भी कर सकते हैं.”
”तब आप कहेंगे अब नौकरी-व्यवसाय पर ध्यान दो, समाज-सेवा कब करेंगे हम?”
”ई-वेस्ट इकट्ठा करके आप कौन सी समाज सेवा करेंगे?”
”देखते जाइए.” कहकर ”सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग?” की चिंता छोड़कर वे फिर अपने काम में लग गए.
गोरेगांव के एक स्कूल में पढ़ने वाले दो स्टूडेंट्स सूर्या बालासुब्रमण्यम और त्रिशा भट्टाचार्य के लिए राष्ट्रीय स्तर की एक प्रतियोगिता से शुरू हुआ एक आइडिया अब एक मुहिम बन गया है.
ज्यादातर घरों में खराब फोन, चार्जर आदि यों ही पड़े रहते हैं, क्योंकि किसी को पता नहीं होता कि उनका क्या किया जाए. सूर्या और त्रिशा ने अपने स्कूलमेट्स से अपने-अपने घरों से ई-वेस्ट लाने को कहा. उन्होंने अपने स्कूल से 180 किलो ई-वेस्ट इकट्ठा किया.
इसके बाद वे बाहर निकले और हाउसिंग सोसायटीज से ई-वेस्ट इकट्ठा किया. उन्हें वॉशिंग मशीन, लैपटॉप, चार्जर जैसी चीजें मिलीं. अब ये दोनों अपनी मुहिम में और भी लोगों की जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.
उन्होंने 380 किलो ई-वेस्ट इकट्ठा किया और उसे एक NGO (नॉन-प्रॉफिट ऑर्गनाइजेशन) को डोनेट कर दिया. NGO ने इंडिया डिवेलपमेंट फाउंडेशन के जरिए ई-वेस्ट इकट्ठा कर रीसाइकलिंग कंपनी को दे दिया. उससे मिले पैसे से 17,000 से ज्यादा वंचित बच्चों को पढ़ाया जाता है.
यानी ई-वेस्ट से मिल सकी 17,000 से ज्यादा वंचित बच्चों की पढ़ाई की राह? ई-वेस्ट डिस्पोजल अभियान एक मुहिम बन गया.

 

अब सब उनकी पीठ थपथपा रहे हैं.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।