लघुकथा

दस साल पीछे

”तुम इतनी ऐक्टिव कैसे रह पाती हो?” तन्वी ने पूछा.
”समय की डोर थामकर चलना मैंने मां से सीखा है.” नव्या ने चाय पीते-पीते कहा.
”वह कैसे?” तन्वी ने पूछा था.
”मैंने मां को कभी यह कहते हुए नहीं सुना है, कि अब मैं बड़ी हो गई हूं या बूढ़ी हो गई हूं.” नव्या बोली थी.
”लेकिन तुम्हारी मां की उम्र तो 96 वर्ष की है न!”
”हां,” नव्या के कथन में उमंग की लहरें तरंगित हो रही थीं, ”अभी भी ममी महीने में दो बार साहित्यिक बैठकों में जाती हैं. दोनों बैठकों में वे नई कविता पढ़ती हैं, इसके अलावा दोनों संस्थाओं की पत्रिकाओं के लिए भी नई-नई कविताएं लिखती हैं.”
”इसका मतलब हर महीने कम-से-कम चार नई कविताएं लिखना और वह भी इस उम्र में! तुम उनकी जो फोटोज़ दिखाती हो, उसमें वे हर बार नई सिल्क की साड़ी पहने होती हैं न!”
”हां, उनका कहना है, कि विदेश में भी भारतीयों की पहचान साड़ी ही है. मजे की बात यह है, कि वे अभी भी मंच पर खड़ी होकर कविता पढ़ती हैं, जबकि आयोजक उन्हें व्हील चेयर पर ही माइक लेकर कविता पढ़ने को कहते हैं.” तन्वी सुन-सुनकर हैरान हो रही थी. नव्या से चलने की बात कहकर वह चल पड़ी.
रास्ते में वह जाते-जाते सोच रही थी, ”मेरी ममी भी 86 की उम्र में बहुत ऐक्टिव हुआ करती थीं और यही कहा करती थीं, ”कभी यह मत कहो, कि अब मैं बड़ी हो गई हूं या बूढ़ी हो गई हूं. एक बार ऐसा कहने से हम दस साल पीछे पड़ जाते हैं.अभी मैं तो 66 की भी नहीं हुई और अपने को बुजुर्ग मानने लगी हूं.”

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “दस साल पीछे

  1. किसी भी तरह की नकारात्मकता जीवन की नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाती है और सकारात्मक ऊर्जा को घटाती है, इसलिए नकारात्मकता को नकारकर सकारात्मकता को वरीयता देनी चाहिए.

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