नई जान

अभी-अभी एक समाचार ने मेरा ध्यान आकर्षित किया-
दिल्ली की हवा में नई जान फूंक रही हैं ये मशीनें
नई जान शब्द मुझे सुदूर अतीत में ले गया. जब मशीनें दिल्ली की जहरीली हवा में नई जान फूंक सकती हैं, तो एक संवेदनशील व्यक्ति एक लगनशील बालक के मन में नई जान क्यों नहीं फूंक सकता है! बहुत साल पहले ऐसा ही हुआ था. हमारे पेन फ्रैंड इंद्रेश ने यह किस्सा बताया था.

बचपन से ही मेरे रिश्ते के एक चाचाजी प्रतिभाशाली और बहुत संवेदनशील थे. लेकिन उनकी प्रतिभा, संवेदनाओं और धैर्य को सौतेली मां की अनावश्यक डांट फटकार और पिटाई निगल गई थी, लिहाजा वे गांव से भागकर शहर पहुंचे. शहर में कोई अपना तो था नहीं, सो उन्होंने एक धनी व्यक्ति का दरवाजा खटखटाया-
”साहब कोई काम मिलेगा?”
”क्या काम कर सकते हो?”
”साहब जो भी कहेंगे. पूरा घर संभाल सकता हूं.” सेठ जी 8-9 साल के उस बालक के साहस और बेबाकी को देखते ही रह गए.
”ठीक है, पर वेतन क्या लोगे?”
”साहब वेतन की क्या आवश्यकता है? सिर छुपाने के लिए जगह चाहिए, वही बहुत है.”
”अंदर चलो, काम ईमानदारी से करना.” सेठजी के घर रहने-खाने का ठिकाना मिल गया था. सचमुच वह बालक सारा घर संभाल रहा था और किसी को उससे शिकायत नहीं थी. प्यार व सम्मान की भी कमी नहीं थी. मालिक का हमउम्र बेटा भी उससे हिलमिल गया था. दोनों एक-दूसरे की परेशानी को बिना कहे ही समझ जाते थे.
”संजू बाबा, आज इतना मायूस-सा क्यों बैठा है?” संजू को परेशान देखकर चाचा जी ने पूछा.
”देखो न! मुझसे ये सवाल नहीं हो रहे, करके नहीं जाऊंगा, तो स्कूल में पिटाई हो जाएगी.”
पिटाई? चाचा जी के सामने सौतेली मां की अनावश्यक डांट फटकार और पिटाई का मंजर जीवंत हो उठा. उसने उसके सारे सवाल हल करवा दिए. संजू हर्षित हो उठा.
शाम को घर आकर सेठ जी ने उसका गृह कार्य देखा, सारे सवाल सही! उन्हें विश्वास नहीं हुआ, उससे पूछा- ”ये सवाल किसने हल करवाए?”
”भैया ने.” संजू ने डरते-डरते कहा. चाचा जी की स्नेहिल पेशी हुई-
”बेटा ये सवाल तुमने कैसे हल कर लिए? कभी स्कूल गए हो क्या?”
”जी, दूसरी कक्षा तक पढ़ा हूं. उसके बाद सौतेली मां की पिटाई से डरकर आपके प्यार की गोद में शरण ली है.”
”पढ़ना चाहते हो?” सेठ जी ने उसके सिर पर प्यार का हाथ फिराते हुए कह ही तो दिया!
”जी मालिक, मौका मिला तो यह अहसान कभी नहीं भूलूंगा.”
फिर क्या था? उसका पढ़ाई और घर संभालने का काम चलता रहा. 12वीं पास करके वे देहरादून में सर्वे आफ इंडिया में नौकरी करने लगे. उन दिनों वह हमारे ही घर पर रहते थे. साथ ही आगे की पढ़ाई भी कर रहे थे.
बचपन में अनावश्यक डांट फटकार और पिटाई, प्यार के अभाव व भारी काम के बोझ ने उनका बचपना तो छीन ही लिया था, साथ ही टी बी की बीमारी भी दे दी. जिसके लिये उन्हें नैनीताल के पास भिवानी सेनेटोरियम में भरती किया गया. वहां से ठीक होकर आने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.
उन्होंने नैनीताल में ही अपनी प्रेस स्थापित की, अपना समाचार पत्र निकाला जो चल निकला. साथ ही वह पढ़ाई भी जारी रखे हुए थे. अब वह एक गणमान्य व्यक्ति बन चुके थे. अच्छा बंगला और बोट हाउस भी था. जाने-माने नेतागण जब भी नैनीताल आते थे, उनके घर पर जरूर आते थे. वह 14 विदेशी भाषाएं फर्राटे के साथ बोल सकते थे, पढ़ व लिख भी सकते थे. मेरे विवाह में सम्मिलित होने भी वह आये थे पर उसी दिन उनकी तबियत खराब हो गयी और उन्हें बीच में से ही जाना पड़ा. कुछ समय बाद उनका देहावसान हो गया. तब उन पर एक लब्धप्रतिष्ठ समाचारपत्र में ‘चर्चित लोग’ कालम में लेख छपा था. स्थानीय दूरदर्शन व आकाशवाणी ने भी उनको श्रद्धांजलि देते हुए एक कार्यक्रम प्रसारित किया था. यह भी एक कमाल ही था जिसमें किस्मत का खेल और पढ़ने की लगन दोनों ही थे.
एक संवेदनशील व्यक्ति ने एक लगनशील बालक के मन में नई जान फूंक दी थी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।