घड़ियाली प्रवृत्ति

पहले कहा जाता था- ‘जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि.’ अब यह बात साक्षात्कर्त्ताओं के लिए ज्यादा तर्कसंगत लगती है. वे मगरमच्छ तक से साक्षात्कार करने से भी नहीं चूकते.
”आप का संक्षिप्त परिचय?”
”मैं मंदिर के तालाब में रहने वाला मगरमच्छ हूं. अक्सर मुझसे प्रश्न किया जाता है.” मगरमच्छ का कहना था.
”इस छोटे-से तालाब में आपको पेट भरने के लिए मछलियां मिल जाती हैं?” साक्षात्कर्त्ता ने एक और प्रश्न उछाला था.
”खाने के लिए मछलियां! लेकिन मैं तो सात्विक और शाकाहारी भोजन खाता हूं.”
”क्या बात करते हैं आप?” साक्षात्कर्त्ता हैरान हो जाता है.
”जी हां, मैं बिलकुल सत्य कह रहा हूं. मैं दिन में दो बार मंदिर से मिलने वाला गुड़-चावल का प्रसाद खाता हूं और घर जाकर सो जाता हूं.”
”घर? तो आपका घर भी है?”
”जी हां, भगवान सबको सब कुछ देता है. मेरे लिए भी उसने इसी तालाब में एक गुफा बना रखी है. वही मेरा घर है. जब मैं भोजन खाने आता हूं, तो पहले पानी में खूब नहा लेता हूं. पुजारी भी साथ-साथ बेखौफ़ होकर नहाते रहते हैं और मछलियां मेरे साथ खेलती रहती हैं.”
”सुना है आपको मुहावरों-कहावतों के बारे में पता है”
”मैं पढ़ा-लिखा तो नहीं हूं, पर आप लोग मगरमच्छ के आंसू या घड़ियाली आंसुओं की बात करके मुझ पर छींटाकशी करते हैं. मैं भी आप लोगों की घड़ियाली प्रवृत्ति का अवलोकन करता रहता हूं.”
”घड़ियाली प्रवृत्ति! पर मैंने तो आज तक यह शब्द नहीं सुना!”
”बात यह है, कि मंदिर के साये में बहुत-से भिखारी भी पलते हैं. कुछ सिरफिरे लोग उनको भीख देते हैं और उनके साथ सेल्फी लेते हैं. सुना है उसे सोशल मीडिया में अपलोड करके खुद को प्रशंसा का हकदार बनाना चाहते हैं.”
”लेकिन आप सेल्फी को घड़ियाली प्रवृत्ति क्यों कहते हैं?”
”और क्या कहूं? आप लोगों के हिसाब से घड़ियाली का अर्थ बनावटी होता है न! वे लोग थोड़ी-सी भीख देकर ढेर सारी प्रशंसा चाहते हैं, तो वे घड़ियाली प्रवृत्ति के ही हुए न!”
”बात तो सही कही है आपने, आपको सेल्फी के बारे में और क्या पता है?”
”मुझे क्या पता साहब! मैं तो सुनता रहता हूं, कि लोग मेरे गुफा से बाहर आने की प्रतीक्षा करते रहते हैं और मौका पाकर मेरे साथ सेल्फी लेते हैं. मैंने तो यह भी सेल्फी लेने की लालसा में जान तक गंवा बैठे हैं.”
”बस, एक आखिरी प्रश्न और. आप अपने को क्या मानते हैं?”
”आपका प्रश्न मुझे बहुत अच्छा लगा. वैसे तो मैं मगरमच्छ हूं, मेरा नाम बबिया है, पर मैं खुद को दीवाना कहता हूं, दीवाना आत्मिक प्रेम का.”
इसके बाद तो साक्षात्कर्त्ता को बबिया और उसके आत्मिक प्रेम को नमन करना ही बाकी था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।