वार्निंग

आज एक समाचार पढ़ने को मिला-
”50 डिग्री सेल्सियस तापमान में तप रहा है चुरू, तंदूरी हैं दिन यहां और तंदूरी हैं रातें”
और फिर
”महाराष्ट्र: पशु कैंप में रहने को मजबूर हैं सूखे की मार से ग्रस्त किसान”
समाचारों की इस भयंकर सुर्खियों ने हमें कई साल पीछे सर्वेश की स्मृति दिलवा दी. सर्वेश सक्सेना उन दिनों बहुत बीमार थे. अस्पताल के आइ.सी.सी.यू. में जीवन-रक्षक मशीनों के सहारे बड़ी मुश्किल से सांस ले पा रहे थे. चेतना आते ही पानी-पानी चिल्लाते, लेकिन पानी पीने की ताकत तो उनमें थी ही नहीं. इसलिए डिहाइड्रेशन से बचाने के लिए उनको ग्लुकोज चढ़ाया जा रहा था.
कभी-कभी सचेत होने पर अपने को मशीनों से घिरा हुआ पाकर वे कह उठते- ”हे भगवान, इससे तो मुझे इस दुनिया से ही उठाले.”
उनकी संसार से उठने की तो मंशा नहीं थी, लेकिन यमराज तो उनके कहने मात्र से ही उन्हें उठाने के लिए आ गए थे. नाम सर्व+ईश होते हुए भी वे घबरा गए- ”यमराज जी, आप कैसे आ गए! आपने अपने आने की अग्रिम सूचना तो भेजी होती!”
”हम अंग्रेजी नहीं समझते, हिंदी में बोलो.”
”सर्वेश जी को उस रिक्शावाले की याद आ गई, जो केंद्र सचिवालय के नाम से तो अपरिचित था, पर सेंट्रल सेक्रेटिरिएट नाम से तुरंत चलने को राजी हो गया. उसने कहा-‘महाराज, कोई वार्निंग तो दी होती!’
”वार्निंग! वार्निंग तो मैंने एक नहीं, हजारों भेजी थीं, तुमने सुनी कहां! मैंने तुम्हारे पास एक चित्र भेजा था, जिसमें एक छोटी-सी बच्ची दरारें पड़ी हुई सूखी धरती पर पता नहीं कितनी दूर से पानी की दो बोतलें भरकर मन में थोड़ा-सा पानी मिल जाने पर तनिक संतुष्ट होकर आ रही थी, तुमने उस चित्र को बेकार समझकर फाड़ दिया, एक समाचार भेजा- ”दिल्ली के एक गांव में सालों बाद नलों में पानी आया.’ तुमने संवेदना प्रकट करने के बदले एक गीत ”जिस दिन नल में पानी आता है, मेरे घर में हलवा बनता है” लिखकर कवि सम्मेलन में वाहवाही लूटी. अब जब दो दिन से तुम्हारे घर पानी नहीं आया, तो तुम्हारी संवेदना जागी, लेकिन तब तक तुम डिहाइड्रेशन के मरीज हो गए. अब भी तुमने बुलाया, इसलिए आया हूं.”
”मैंने तो ऐसे ही दुःखी होकर कहा था, आपको बुलाया थोड़े ही था! एक बार थोड़ी मोहलत दे दीजिए.”
”थोड़ी मोहलत से तुम क्या कर लोगे? सालों से ग्लोबल वार्मिंग के बारे में पढ़ते-सुनते आ रहे हो, फिर भी अपने फर्नीचर के बिजनेस के लिए पेड़ कटवाते जा रहे हो, नए पेड़ लगवाते नहीं हो, पानी की बरबादी रोकते नहीं हो, बल्कि पीने के पानी से गाड़ियां धुलवाने में तनिक भी नहीं सोचते-सकुचाते हो, नदियों में कारखाने का रासायनिक कचरा डालते हो, पहाड़ों पर घूमने जाते हो वहां भी कूड़ा फैलाकर आते हो, प्लास्टिक का प्रयोग कर धरती मां का प्रदूषण बढ़ाते हो, थोड़ी मोहलत में क्या-क्या कर लोगे?”
”मैं पर्यावरण से मित्रता कर लूंगा और अमानत में खयानत नहीं करूंगा.” सर्वेश ने शायद यमराज की वार्निंग को सुदृढ़ संकल्प का रूप दे दिया था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।