जन्मदिन का प्यार, लाया आपके लिए एक उपहार

कभी-कभी कोई जन्मदिन इतना यादगार बन जाता है, कि ताउम्र याद रहता है. मैं हिंदी अध्यापिका के पद पर सरोजिनी नगर के नं.- 1 स्कूल में सितंबर 1983 में गई थी. 10.9.1984 को इस स्कूल में मेरा पहला जन्मदिन था. सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली मेरी एक छात्रा जयश्री पिप्पिल मेरी कविताओं का पाठ इस नायाब तरीके से करती थी, कि उसको जिस भी विषय पर कविता- प्रतियोगिता में भेजा जाता, वह प्रथम पुरस्कार से पुरस्कृत होकर आती थी और स्कूल में भी बहुत सम्मानित होती थी. यही कारण था, कि मुझे तो जयश्री पिप्पिल भा ही गई थी और जयश्री पिप्पिल को भी मुझसे लगाव हो गया था.

किसी तरह 10.9.1984 को जयश्री को पता चल गया कि आज मेरा जन्मदिन है, उसे बहुत अफसोस हो रहा था, कि मैम के लिए वह कोई उपहार क्यों नहीं ला सकी! फिर उसने जुगत लगाई और स्कूल की बगिया से कुछ फूल चुनकर मेरे लिए लिए प्यारा-सा गुलदस्ता बना लाई. अच्छी कलाकार तो वह थी ही, उसीसे आप अंदाजा लगा सकते हैं, कि गुलदस्ता कितना खूबसूरत बना होगा. तुरंत उस गुलदस्ते पर हमारी कलम से (उन दिनों कर्सर का तो चलन ही नहीं था) उस छोटी-सी छात्रा के द्वारा प्रेम से दिए गए उस पुष्प-गुच्छ पर एक कविता निःसृत हुई. आप उस कविता का रसपान कीजिए.

 

लाल फूल

वह आई,
हाथों में जन्मदिन का उपहार लिए,
लाल पुष्पों का गुलदस्ता लिए,
लाल पुष्प-गुच्छ के प्रत्येक पुष्प में,
प्रेम और प्यार लिए.
लाल रंग, जो प्रतीक है प्रेम का,
राधा-कृष्ण के प्यार का,
कृष्ण-सुदामा के स्नेह का,
कृष्ण-यशोदा के वात्सल्य का,
कृष्ण-संदीपनी के नेह का.
लाल रंग, जो प्रतीक है उत्साह का,
देश हेतु मर मिटने के जोश का,
अन्याय से लड़ सकने के ओज का,
दीन-दुखियों की सेवा व सोज़ का,
ऊंच-नीच का भाव मिटाने के होश का.
इसकी पांच पंखुड़ियां प्रतीक हैं,
पांच ज्ञानेंद्रियों के सदुपयोग की,
पांच कर्मेंद्रियों के सद्विकास की,
हाथ की पांच उंगलियों के सद्व्यवहार की,
पांच महाविकारों के सर्वनाश की,
प्रेम से दिए गए ये फूल, सदा रहेंगे याद,
उसकी सद्भावना को, सदा रखेंगे आबाद.
10.9.84

जयश्री के बारे में अधिक जानने के लिए यह ब्लॉग पढ़िए-
प्रतिभा की मल्लिका: जयश्री पिप्पिल

https://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/?p=46947

हो सकता है प्रतिभा की मल्लिका जयश्री पिप्पिल अब एक महान लेखिका व कवयित्री बन गई हो.

यों तो हमारे बहुत-से जन्मदिन बहुत ही विशेष और यादगार हैं, पर एक और ब्लॉग के उल्लेख के बाद आपके लिए एक उपहार-

यादगार जन्मदिन. प्रस्तुत हैं इस ब्लॉग में से फूलों की दो कविताएं-

इन्द्रधनुष था हाथ में आया – जन्मदिन मुबारक
जन्मदिवस की पावन वेला, मन में था खुशियों का मेला.
सखियों ने वह रंग जमाया, इन्द्रधनुष था हाथ में आया.

एक सखी ने लाल फूल दे, मुझ पर प्रेम-प्यार दर्शाया.
उन फूलों ने उस पल मेरे, मन का आनंद और बढ़ाया.

एक सखी ने श्वेत सुमन दे, अपना पावन दिल दिखलाया.
उन फूलों ने उस पल मेरे, मन को पावन और बनाया.

एक सखी ने सुमन गुलाबी, देकर मन को मस्त बनाया.
उन फूलों ने उस पल मेरे, इन्द्रधनुष को और सजाया.

एक सखी ने पीले फूल दे, मन में मानो जादू जगाया.
उन फूलों ने उस पल मेरे, मन को साहस से सरसाया.

आसमान का इन्द्रधनुष तो, होता बस पल भर की माया.
फूलों के उस इन्द्रधनुष ने, कई दिनों तक मुझे लुभाया.

सखियों ने वह रंग जमाया, इन्द्रधनुष था हाथ में आया,
इन्द्रधनुष था हाथ में आया, इन्द्रधनुष था हाथ में आया
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शहनाई-से पीले फूल

खुशियों की पांखें ले आए, शहनाई-से पीले फूल,
जन्मदिवस का तोहफ़ा लाए, शहनाई-से पीले फूल.

मन में तरल तरंगें लाए, शहनाई-से पीले फूल,
सागर जैसी उमंगें लाए, शहनाई-से पीले फूल.

आनंद की बगिया ले आए, शहनाई-से पीले फूल.
सद्भावों का सागर लाए, शहनाई-से पीले फूल.

सांसों की सरगम सरसाएं, शहनाई-से पीले फूल.
सखियों का तन-मन हर्षाएं, शहनाई-से पीले फूल.

यादों के पल फिर ले आए, शहनाई-से पीले फूल.
कैसे-कैसे रंग दिखाएं, शहनाई-से पीले फूल.

सूरज जैसे दम-दम दमकें, शहनाई-से पीले फूल.
चंदा चम-चम चमकें, शहनाई-से पीले फूल.

मन में साहस-तेज जगाएं, शहनाई-से पीले फूल.
पीताम्बर की झलक दिखाएं, शहनाई-से पीले फूल.

खुशियों की पांखें ले आए, शहनाई-से पीले फूल,
जन्मदिवस का तोहफ़ा लाए, शहनाई-से पीले फूल.
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आपके लिए सप्रेम एक उपहार-
ई. बुक लघुकथा संग्रह- 1- मैं सृष्टि हूं

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।