कवितागीत/नवगीतहाइकु/सेदोका

होलिया में उड़े रे गुलाल: काव्य-रचनाएं: आपकी-हमारी-1

1.होली-हाइकु

1.प्रभु की लीला
प्रहलाद बचाया
जली होलिका.

2.जली होलिका
हिरण्याकुश हारा
ख़ुशी मनाओ.

3.ख़ुशी मनाओ
रंग बरंगे रंगों से
रंगो मन को!

4.रहे ध्यान
स्वच्छ भारत का
बढ़ेगा मान.

5.विदेशी आते
व्यापार भी बढ़ाते
देखते होली!
-गुरमेल भमरा

आप सबको यह जानकर अत्यंत हर्ष होगा, कि हमने रात को सोने से पहले प्रिय गुरमैल भाई जी को होली पर काव्य-रचना लिखकर भेजने की याद दिलाई थी, सुबह मेल खोलते ही उनकी बहुत सुंदर काव्य-रचना तैयार मिली.
हिरण्याकुश हारा में अनुप्रास अलंकार की सुंदर छटा दर्शनीय है.
हाइकु में गुरमैल भाई द्वारा 5-7-5 शब्दों के क्रम का पूरा ध्यान रखा गया है.

आप ध्यान से देखेंगे तो समझ जाएंगे, कि गुरमैल भाई जी ने हाइकु लिखने चाहे थे, लेकिन उनकी लेखनी से हाइकु तो निःसृत हुए ही, यह हाइकु गीत (एक नई विधा) बन गया है. इस होली हाइकु गीत में एक तारतम्य तो है ही, होली की पूरी कहानी भी समा गई है.गुरमैल भाई, बहुत-बहुत शुभकामनाएं.

गुरमैल भमरा की ब्लॉग वेबसाइट-
https://jayvijay.co/author/gurmailbhamra/

2,टूटे नाते फिर से जोड़ें (गीत)

रंगों की बरसात हो रही
सब रंग मिल कर खेल रहे
कौन हूं मैं और कौन हो तुम
इस बरखा में भूल रहे.

आओ गुड्डू, खाओ लड्डू
कड़वेपन में भर दो मिठास
रंगों की इस बरसात में तुम
नाराजियों की भूलो खटास.

देखो अम्मा वहां खड़ी हैं
आओ उनके पास चलें
रंग दें उसके चरणों को हम
अबीर-गुलाल से नमन करें

दादा के पिचके गालों पर
रंगों का हम कर दें लेप
उनके मुख पर लाकर खुशियां
बचपन की लौटा दें खेप.

अबीर-गुलाल की बौछड़ ने
औ’ रंगों की बरसातों से
सबने मिलकर रंग दिया हमको
खुशियों की सौगातों से.

इस रंग का कोई नाम नहीं
इस रंग का कोई धाम नहीं
रंगों की यह देखो टोली
धूम मचा रही ‘आई होली’.

होली के रंगों में डूबके
मजे लिए हमने भी खूब
उड़ो भले हों पैर जमीं पर
ध्यान रहे कहीं दबे न दूब.

आओ मिलकर लगें गले
वैर-भाव को जड़ से छोड़ें
नफरत की दीवारें तोड़ें
टूटे नाते फिर से जोड़ें
टूटे नाते फिर से जोड़ें
-सुदर्शन खन्ना

सुदर्शन खन्ना का ब्लॉग
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3.होली खेलने आया हूँ

बावरी राधा, कृष्ण कन्हैया
वृन्दावन के गोप-गोपियाँ
प्यारे मनमोहन की
मुरली मधुर बजाने आया हूँ
होली खेलने आया हूँ.

मौसम हो आशिकाना,
गाये जा प्रीत-तराना,
दीवाना दिल परवाना,
अबीर-गुलाल उड़ाने आया हूँ
होली खेलने आया हूँ.

होली का हुड़दंग,
मदहोश आज उमंग
मचले प्रेम-तरंग
मतवालों की टोली लाया हूँ
होली खेलने आया हूँ.

महकती हो बयार
प्रकृति का सोलह श्रृंगार
प्रेम का कर लो इजहार
हर दिल को बहकाने आया हूँ
होली खेलने आया हूँ.

भर-भर पिचकारी नवरंगों से
उमड़-घुमड़ अनुराग-रंग बरसे
धूम मचाने, गीत गुनगुनाने
प्रीत-झंकार सुनाने आया हूँ.
होली खेलने आया हूँ.

आनंद-मंगल हो
हर दिल-आँगन में,
चुस्त रहें, मस्त रहें
अलबेले फागण में
शुभ सन्देशा मैं लाया हूँ.
होली खेलने आया हूँ.

न छोटा, न बड़ा कोई
भेदभाव मानूं न कोई,
हम हैं मस्त-मनमौजी
प्रियतमा से मिलने आया हूं,
होली खेलने आया हूँ.

रंग प्यार का, रंग सुकून का
रंग लाया हूं खुशी का
तन-मन आनंद-रंग में रंगने
सप्त-सुरों का साज लाया हूँ
होली खेलने आया हूँ.

रौनक बहार की लेकर
प्रीत की रीत निभाने,
प्रियतमा से मिलने,
आनंद-उत्सव मनाने आया हूँ
होली खेलने आया हूं.

वृन्दावन का नटखट
कृष्ण कन्हैया बन आया हूँ
होली खेलने आया हूँ.
-चंचल जैन
चंचल जैन का ब्लॉग
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4.होली (बाल गीत)

लाल-गुलाबी-नीले-पीले,
रंग ले होली आई है.
केसर-अबीर-गुलाल सजीले,
लेकर होली आई है.
तन को रंग लो, मन को रंग लो,
जीवन रंगने आई है.
टेसू-गेंदा और गुलाब ले,
जग महकाने आई है.
-लीला तिवानी

5. होलिया में उड़े रे गुलाल (लोक गीत)

होलिया में उड़े रे गुलाल, कहियो मेरे कान्हा से
आए लेके लाल गुलाल, कहियो मेरे कान्हा से-
1.म्हारी तो राधा चुड़ला वाली
घड़िया वालो नंदलाल कहियो मेरे कान्हा से-
2.म्हारी तो राधा बेसर वाली
मुरली वालो नंदलाल कहियो मेरे कान्हा से-
3.म्हारी तो राधा पायल वाली
घुंघरू वालो नंदलाल कहियो मेरे कान्हा से-
4.म्हारी तो राधा नखरा वाली
पीछे-पीछे भागे नंदलाल कहियो मेरे कान्हा से-
-लीला तिवानी

लीला तिवानी का ब्लॉग
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*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

One thought on “होलिया में उड़े रे गुलाल: काव्य-रचनाएं: आपकी-हमारी-1

  • लीला तिवानी

    इस बार हमने होली के पावन अवसर पर एक नवीन प्रयोग करने का मन बनाया था और आप सबका आह्वान किया था. सचमुच आपकी-हमारी होली की काव्य-रचनाएं विभिन्न रंगों की आ गई है. गुरमैल भाई ने होली-हाइकु लिख भेजें हैं, तो सुदर्शन भाई ने ऐसा गीत लिख भेजा है, कि होली की ‘टूटे नाते फिर से जोड़ें; की परंपरा जीवंत हो उठी हैं. चंचल जैन ने प्रीत-तराना गाकर मौसम आशिकाना कर दिया है. हमारा बाल गीत और लोक गीत भी होली को रंगीन बनाने में सक्षम हैं. दूसरे भाग में भी आपको बहुत सुंदर नए रंग मिलेंगे. होली की कोटिशः हार्दिक बधाइयां व शुभकामनाएं.

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