लघुकथा

रफू

”प्रातःभ्रमण करके आ रहे हो?” साइकिल पर आ रहे साहिल से सुयश ने पूछा.
”जी हां, शुरू से ही आदत जो बनी हुई है! इसके बिना चैन कहां?”
”क्या देखकर आए हो!”
”वही, जो रोज दिखाई देता है. फूल-पत्ते, चिड़ियां-तितलियां. हंसते-मुस्कुराते चेहरे, मन खुश हो जाता है.”
यह तब की बात थी, जब साहिल छोटा-सा बच्चा था. तब तो वह मस्ती-मस्ती में साइकिल पर प्रातःभ्रमण करता था. अब वह अधेड़ उम्र का हो गया है और साइकिल चलाने को उत्तम व्यायाम मानकर ऐसा करता है. ऐसे प्रश्न-उत्तर अभी भी पूछे जा रहे हैं.
”प्रातःभ्रमण करके आ रहे हो?” साइकिल पर आ रहे साहिल से किसी ने पूछा.
”जी हां, बचपन से ही आदत जो बनी हुई है! इसके बिना चैन कहां?”
”क्या देखकर आए हो!”
”वही, जो रोज दिखाई देता है. कालिख का झुरमुट, आग उगलते हुए इंटरनेट के टॉवर, सूर्य की लालिमा को निगलने वाला वाहनों और कारखानों की चिमनियों से निकलने वाला धुआं, घुटन से बेहाल हुए परिंदे और पीठ पर ऑक्सीजन के सिलिंडर ढोए हुए बेबस लोग!”
”फिर उसके लिए तुम क्या कर रहे हो?” पूछने वाले ने तो पूछ लिया, पर साहिल तो चकरा ही गया. क्या जवाब दे, कुछ सूझ ही नहीं रहा!
”मैं क्या कर सकता हूं?” खिसियाकर बोला.
”सब यही कहेंगे, तो फिर करेगा कौन?” प्रश्न पर प्रश्न था.
”अगर मानो तो, सप्ताहांत में मैं भी साइकिल लेकर तुम्हारे साथ निकलूंगा और हम पोस्टर लेकर लोगों को कारों-वाहनों आदि के धुएं से होने वाले नुकसान से आगाह करेंगे.” साहिल के सामने एक प्रस्ताव था.
”एक और एक तो ग्यारह होते ही हैं, हो सकता है कुछ अन्य लोग भी हमारे साथ जुड़ जाएं और अगर हम कारों का थोड़ा भी प्रयोग कम करा पाए, लोगों को जागरूक ही करा पाए, तो शायद यह कालिख कम हो पाए,” प्रस्ताव पर साहिल भी उत्साहित था.
”सही कह रहे हो मित्र, तब हम बरबादी की चेतावनी देने वाले ओज़ोन की छतरी के छेद पर थोड़ा रफू कर पाएंगे.”
”पोस्टर बनाने में मुझे रुचि भी है और लोगों को मेरे पोस्टर पसंद भी आते हैं, इसकी जिम्मेवारी मेरी.” कहकर साहिल पोस्टर के लिए जरूरी सामान जुटाने चल पड़ा.

परिचय - *लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “रफू

  1. एक और एक ग्यारह होकर कुछ प्रयास किये जायेंगें तभी ओज़ोन परत में छेद को रफ़ू किया सकता है! जबतक हम अपनी आराम परस्ती की सोच को रफ़ू नहीं करेंगें शायद तब तक नहीं, चौबीसों घण्टे ac, सब्जी खरीदने भी बाजार स्कूटर/मोटरसाइकिल या कार से जाना, अनियंत्रित पानी का दोहन और उसकी बर्बादी, अनैतिक खनन, पहाड़ों को काट-काट कर सड़कों और कांक्रीट के जंगलों के निर्माण, जंगलों/बागों को काटकर बड़ी-बड़ी कॉलोनियों के निर्माण, सरकारी बसों से निकलने वाले धुंए पर किसी प्रकार की रोकथाम नहीं और पेट्रोल कार का puc होना अनिवार्य! बहुत सी बातें और योजनाएं हैं जो इनकी जिम्मेदार हैं। सरकारी विभागों की लापरवाही जिसका सबसे बड़ा कारण है। ये तो अच्छा है कि साहिल जैसे हजारों लोग जागरूक हो चुके हैं और हो रहे हैं वरना अब तक क्या हो चुका होता सोच कर ही भय से लगता है। शेष तो भारत राम भरोसे चल ही रहा है। सब मिलकर ओज़ोन की छतरी में रफू का सपना पूरा कर सकते हैं.

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