गीतिका/ग़ज़ल

इश्क़ निभाई जाए

एक टुकड़ा इश्क का गर मिल जाए
ये जिंदगी अपनी जन्नत-सी हसीन हो जाए।
इस दिल पे तुम्हारा इख्तियार हो जाए
तेरे इश्क में ये रुह फना हो जाए।
ग़म के काले घने बादलों के दरम्यान
तेरे इश्क की बिजली कौंध -सी जाए।
स्याह सर्द अंधेरी रातों में
तेरे इश्क की शमा रौशन हो जाए।
उम्र गुजर गई तमाम इश्क की तलाश में
अब तो बस मौत से ही इश्क निभाई जाए।
— विभा कुमारी “नीरजा”

Leave a Reply