कविता

तमन्नाएं

चाहे जितना कोई समझाए
दिल यह मान नही पाता
अब पहले सी बात नही वह
सुनना हमको नही भाता ।।

खुद को तो अब भी लगता है
सब कुछ हम निपटा सकते हैं
छोटी मोटी कोई समस्या
पल में दूर भगा सकते हैं

यूं घबराकर पीठ दिखाना
हमको रास नही आता
अब पहले सी बात नही वह
सुनना हमको नही भाता ।।

स्वादिष्ट व्यंजन, स्वस्थ मनोरंजन
अब भी मन को हर्षाता हैं
प्राकृतिक दृश्यों का अवलोकन
भाव रुपहले भर जाता हैं

अब उमंग नहि बचपन वाली
दिल मंजूर न कर पाता
अब पहले सी बात नही वह
सुनना हमको नही भाता ।।

जब भी कोई महफ़िल सजती
तमन्नाएं दिल की हिलोरे भरती
कैसे हम भी हो जाएं शामिल
स्वप्न सुनहरे बुनने लगती

कैसे तुम पहुंचोगे वहां तक
सुनकर दिल नहि घबराता
अब पहले सी बात नही वह
सुनना हमको नही भाता ।।

नई नई जगहों पर जाना
सुदूर वादियों में मौज मनाना
किया न अब तक, वह कर जाना
हो पाएगा, विश्वास जगाना

झरझर बहता उज्जवल झरना
अब भी मन को खूब सुहाता
अब पहले सी बात नही वह
सुनना हमको नही भाता।।

अब पहले सी बात नही वह
सुनना हमको नही भाता।।

— नवल अग्रवाल

नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई