लघुकथा

नई सदी का मेला

अंतरिक्ष पर बने शहर में पहली बार मेला आयोजित किया गया था। बीटा एलियन जरा कपड़े का फटका तेज चला एनर्जी ड्रिंक को जरा करीने से जल्दी सजा लोगो के आने का वक्त हो गया है। “हाँ ! जी अल्फा जी बीटा देखो सामने से लोग आते नजर आ रहे है। उन्हें रक्त दान करने […]

हास्य व्यंग्य

घर से निकलते ही … कुछ दूर चलते ही 

घर से निकलते ही हमारा सामना ऐसे लोगों से अक्सर हो जाता है  जो अपने फनी व्यवहार से जाने जाते हैं । एक बार प्लेटफार्म पर शर्मा जी खड़े  गाड़ी आने का इंतजार कर रहे थे तभी वर्मा जी मिल गए बोले और भाई साहब ट्रेन से जा रहे हो अब जाहिर सी बात है […]

कहानी

छद्म वेश 

शाम  धुंध में डूब चुकी थी होटल की ट्यूटी खत्म कर तेजी से केमिस्ट की दुकान पर पहुंची। उसे देखते ही केमिस्ट सेनेटरी पैड को पेक करने लगा। रंजना ने उससे कहा इसकी जगह मेन्सुअल कप दें दो। केमिस्ट ने एक पैकेट उसकी तरफ बढ़ाया। मधुकर सोच में पड़ गया। रंजना इससे बेखबर पैकेट को […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – क्या  से क्या हो गई ….ये हवा

इंदौर नगरी अपने भाई के पास घूमने आए  दामोदर ने सुनील से कहा छुटके  यहां बड़ा दम घुट रहा है   घर के अंदर की हवां में भी धुएं की महक आ रही है‌ भाई साहब बहुत साल बाद दिल्ली आये हो यहाँ की तो हवा पानी सब खराब हो गया  है । छुटके पानी की […]

लघुकथा

लघुकथा – जीने की वजह

सुबह वृद्धाश्रम पहुँच कर सारी कार्यवाही पूरी कर बेटा बहू जाने लगे तो हतप्रभ सा पोता बोला माँ दादाजी को भी साथ ले चलो, सुनते ही बहू ने उसका हाथ कस कर पकड़ा  और घसीटते हुए ले जाने लगी पोते की आँखो में आंसू देख कर मन अंदर तक व्यथित हो गया । ”  बेटा […]

लघुकथा

लघुकथा – जोकर

दर्शक दीर्घा में बैठे हुए सोच रही थी कलाबाजियां दिखाते हुए तीन फिट के जोकर को जो चेहरे पर निरंतर मुस्कुराहट लिए करतब दिखा रहा था।  उसकी अजीबोगरीब हरकतों से बच्चें उछल उछल कर तालियां बजा रहे थे ।  पता नहीं मेरा मन कुछ विचलित सा हो रहा था उस जोकर से बात करने के […]

कविता

दिसंबर चलने को है

पैरों की थकन क्या कहूँ उम्र हुई चलते चलते हर बार दिसंबर आता है यादें सुहानी छोड़ जाता है दिसम्बर की इतनी कहानी है जैसे याद आई गुजरी जवानी है कभी टीस सी रह जाती है तब तक जनवरी आ जाती है कुछ सोचू तो फुर्र हवा सी फरवरी भी उड़ जाती है होली के […]

कविता

आँखे

आँखे भूरी सुनहरी नीली आँखे गहरी झील सी आँखे मुदी पलकों में देखती सपनें आँखे खुली तो ख्वाबों को हकीकत में बदलती आँखे चित चोर तेज धार सी आँखे स्वपनीली मदहोश सी आँखे घनेरी पलकों में बसी खूबसूरत आँखे खुशी और ग़म के अश्रू से छलकती आँखे ममता से सराबोर कभी क्रोध में धधकती आँखे […]

कविता

उड़ान बाकी है

तिनकों को जोड़कर बना घोंसला हमारा इस प्यारे ‌से घोंसले में । अभी-अभी जन्मी हूँ। सुकोमल नरम सी नन्हें से परो का निकलना बाकी है दिन भर खाने की तलाश में माँ का चुग्गा लाना बाकी है। भूख मिटा देती है माँ खुद कभी -कभी रह जाती भूखी रोज थोड़ा थोड़ा उडना माँ हमें सिखाती […]

कविता

मेरे अल्फ़ाज़

आज मेरे अल्फ़ाज़ मुझसे खफा हो गए । खिड़की के रास्ते दफा हो गए । कितने मासूम लगते मुंह के अंदर । बाहर निकलते ही हवा हो गए । हाय मेरे अल्फ़ाज़ मुझको दगा दे गए । कोई पकड़ो इन ना मुरादों को । इन के ना पाक इरादे हमें खफा कर गऐ। इश्क पर […]