राजनीति

जन विमुख जनतन्त्र

छब्बीस जनवरी को फिर से मनाया जाएगा गणतन्त्र दिवस। ठीक वैसे ही जैसे पाँच महीने पहले मनाया गया था स्वाधीनता दिवस। ये दोनों हमारे जन्म से बहुत पहले से मनाए जा रहे हैं। शायद आप भी न जन्में हों या नन्हें-मुन्ने रहे हों। सच की दस्तक भी नहीं जन्मा था। यकीनन नहीं जन्मा था। हमने […]

भाषा-साहित्य

जीने की कला का दस्तावेज : “जीना इसी का नाम है”

साहित्य का मूल अभिप्राय है सहित की भावना का विकास करना। वही मनुष्य जीता हुआ माना जाता है जिसमें साहित्य के प्रति लगाव हो। जो सबको साथ लेकर चल सके। जिसका जीवन जीने के पावन उद्देश्य से भरा हो। जो गर्व से कह सके कि उसने जीवन जीया है और सबको भी ऐसा ही लगे। […]

गीतिका/ग़ज़ल

धूप-छाँव

कभी तुम धूप लगते हो कभी तुम छाँव लगते हो, शहर की बेरुखी में तुम तो अपना गाँव लगते हो। बताओ मैं भला कैसे कहूँ अपनों ने ठुकराया, सभी राहें हुई जो बंद अंतिम ठाँव लगते हो। कभी जब बात करते हो लुटे अधिकार की अपने, सगे  सम्बंधियों के बीच कौआ-काँव लगते हो। जो कहते […]

इतिहास

अमर अभिमन्यु ने चक्रव्यूह को किया था छिन्न-भिन्न

प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के राष्ट्रवादी महानायक बाबू वीर कुँवर सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। 26 अप्रैल 1858 को आजाद जगदीशपुर में उन्होंने अंतिम साँस ली। उनके दोनों ही सपूत उत्तर प्रदेश की पावन भूमि पर अंग्रेजों को मुँह तोड़ जवाब देते हुए कुर्बान हो गए थे। उसके बाद की कहानी पर इतिहास प्रायः […]

कविता

ढाक के तीन पात

सम्बंधों के शेयर बाजार में हर बार लगाता रहा अपनी सकल जमा पूँजी बिखरती हिम्मत को जुटाकर चकनाचूर हौसलों को जोड़कर उड़ते फाहों को धागे के रूप में पुनः पिरोकर हृदय को पहले से अधिक कठोर कर समूल घाटे को भुलाकर कुछ पाने की आस में उजड़ते उपवन के बिखरते सुवास में सब कुछ दाव […]

कविता

दीपोत्सव

किसी जगह पर दीप जले अरु कहीं अँधेरी रातें हों । नहीं दिवाली पूर्ण बनेगी, अगर भेद की बातें हों ।। ऐसे व्यंजन नहीं चाहिए, हक हो जिसमें औरों का । ऐसी नीति महानाशक है, नाश करे जो गैरों का ।। हम तो पंचशील अनुयायी, सबके सुख में जीते हैं । अगर प्रेम से मिले […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

विलखतीं रोज सीतायें बचाना भूल जाते हैं। मगर नारी की महिमा पर गजल औ गीत गाते हैं। दिलों में लाख रावण को छिपाये घूमते हैं पर- बनाकर कागजी रावण विजय उत्सव मनाते हैं।। पिता का साथ छूटे तो ये दुनिया रूठ जाती है। सगे रिश्तों के माला की कड़ी भी टूट जाती है। मरे जब […]

बाल कविता

अदला – बदली

सुबह जगाने आता सूरज, शाम सुलाने आता चंदा। गर अदला-बदली हो जाए, झूम – झूमकर गाए बंदा।। पता नहीं सूरज को निश दिन, इतनी सुबह जगाता कौन? दिन भर गायब रहता चंदा, ठीक शाम को लाता कौन? कोई पता बता दे उसका, जो इनको ड्यूटी देता है। क्या ये नहीं बगावत करते? या तो वो […]

गीत/नवगीत

नारी को अधिकार मिले

जब से नारी को नारी का, सम्बल मिलना शुरु हुआ। वसुधा से उठकर नारी ने, हाथों से आकाश छुआ।। पग – बाधा बनकर नारी ने, नारी को अक्सर रोका। नारी ने इतिहास रचाया, जब भी उसे मिला मौका।। आँख खोलकर देख पाँव अंगद- सा जमां जमीं पर है। और हाथ में सीढ़ी अथवा, सीढ़ी ही […]

गीत/नवगीत

मैं दीन – हीन लघु दीप एक

मैं दीन – हीन लघु दीप एक, थोड़ा – सा स्नेह प्रदान करो। रख दो गरीब की कुटिया में, उनकी रजनी भी जाग उठे। आँगन में कुछ खुशहाली हो, उनके उर सरगम राग उठे।। जुगनू भी रूठें हों जिनसे, उनके मन में कुछ आस भरो। मैं दीन – हीन ……………।। बाती मेरी अधजली सही, फिर […]