मुक्तक/दोहा

मुक्तक

विलखतीं रोज सीतायें बचाना भूल जाते हैं। मगर नारी की महिमा पर गजल औ गीत गाते हैं। दिलों में लाख रावण को छिपाये घूमते हैं पर- बनाकर कागजी रावण विजय उत्सव मनाते हैं।। पिता का साथ छूटे तो ये दुनिया रूठ जाती है। सगे रिश्तों के माला की कड़ी भी टूट जाती है। मरे जब […]

बाल कविता

अदला – बदली

सुबह जगाने आता सूरज, शाम सुलाने आता चंदा। गर अदला-बदली हो जाए, झूम – झूमकर गाए बंदा।। पता नहीं सूरज को निश दिन, इतनी सुबह जगाता कौन? दिन भर गायब रहता चंदा, ठीक शाम को लाता कौन? कोई पता बता दे उसका, जो इनको ड्यूटी देता है। क्या ये नहीं बगावत करते? या तो वो […]

गीत/नवगीत

नारी को अधिकार मिले

जब से नारी को नारी का, सम्बल मिलना शुरु हुआ। वसुधा से उठकर नारी ने, हाथों से आकाश छुआ।। पग – बाधा बनकर नारी ने, नारी को अक्सर रोका। नारी ने इतिहास रचाया, जब भी उसे मिला मौका।। आँख खोलकर देख पाँव अंगद- सा जमां जमीं पर है। और हाथ में सीढ़ी अथवा, सीढ़ी ही […]

गीत/नवगीत

मैं दीन – हीन लघु दीप एक

मैं दीन – हीन लघु दीप एक, थोड़ा – सा स्नेह प्रदान करो। रख दो गरीब की कुटिया में, उनकी रजनी भी जाग उठे। आँगन में कुछ खुशहाली हो, उनके उर सरगम राग उठे।। जुगनू भी रूठें हों जिनसे, उनके मन में कुछ आस भरो। मैं दीन – हीन ……………।। बाती मेरी अधजली सही, फिर […]

इतिहास

बाबू वीर कुँवर सिंह का राष्ट्रवादी नायकत्व

पावन त्याग और अतुलित बलिदान की यशोभूमि का नाम है  भारत वर्ष। शिशु अजय सिंह के बलिदान, साहिबजादा जोरावर सिंह व साहिबजादा फतेह सिंह का प्राणोत्सर्ग, शिशु ध्रुव के तप, शिशु प्रह्लाद की भक्ति, शिशु कृष्ण की बाललीला और वयोवृद्ध फौलादी बाबू वीर कुँवर सिंह की युद्धनीति तथा राष्ट्रवादी भावना का इतिहास में कोई सानी […]

भाषा-साहित्य

भारत में राष्ट्रभाषा का प्रश्न और हिंदी

हर राष्ट्र की अपनी एक राष्ट्रभाषा होती है इसलिए भारत जैसे सम्प्रभुता सम्पन्न, विशाल, सबसे बड़े गणतन्त्र राष्ट्र की भी अपनी राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। यह प्रश्न तब तक उठना स्वाभाविक और उचित भी है जब तक भारत की अपनी राष्ट्रभाषा न चुन ली जाए। लेकिन आजादी के सात दशकों के बाद भी दुर्भाग्यवश अब तक […]

भाषा-साहित्य

लाल-लाल लट्टू नचाने वाला…..

वक्त के साथ जमाना बदला और बदल गए बच्चों के सारे खेल भी। गुल्ली डंडा, आँख मिचौली, लट्टू नचाने से होते हुए विडियो गेम को पार कर जानलेवा मोबाइल गेम तक आ गए हैं हम। न केवल खेलों का स्वरूप बदला है बल्कि समाज के स्वरूप में भी आमूल चूल परिवर्तन आया है। मनोरंजन, संगीत, […]

राजनीति

सदी के महानायक का मौन-मुखर व्यक्तित्व

बोलने को तो सभी बोलते हैं। नदी, नाले, समंदर, झरने भी बोलते हैं। पशु-पक्षी भी बोलते हैं। महसूस करें तो विनाश के पूर्व और बाद का सन्नाटा भी बोलता है। किन्तु ये सब सिर्फ बोलते हैं या सिर्फ चुप रहते हैं। इंसान ही ऐसा है जो बोलकर भी चुप रह सकता है और चुप रहकर […]

राजनीति

चलना जरा सम्हल के कंगना, अंगना टेढ़ा है

भारत की व्यावसायिक/व्यापारिक राजधानी मुम्बई यूँ तो हमेशा से ही खास रही है। आजकल उद्धव- संजय की नादानियों ने और कंगना की विरुदावलि ने तापमान कुछ ज्यादा ही बढ़ा दिया है। देश की तथाकथित बुद्धिजीवी जनता भी दो खेमों में एक-दूसरे पर गुर्राती नजर आ रही है। केन्द्र में बैठी भाजपा मुफ्त के अलाव में […]

मुक्तक/दोहा

भारतेन्दु हरिश्चंद्र

भारतेन्दु  हरिश्चंद्र जी की, कलम रचे वो छंद। खुल जायें सब द्वार दिमागी, जो थे पहले बंद।। हो   कोई   चौपट राजा  या, हो अंग्रेजी राज। शोषण के विपरीत लड़ा है,उनका सकल समाज। एक साथ रच डाले नाटक, कविता विपुल निबंध। मंचों पर अभिनय के द्वारा, तोड़े वर्जित बंध।। हिंदी माता की गोदी में, हुआ न […]