समाचार

राष्ट्रवादी कृति इनसे हैं हम शिक्षको में भी लोकप्रिय

आजादी के अमृत महोत्सव के परिप्रेक्ष्य में गुमनाम पूर्वजों की यशगाथा पर आधारित राष्ट्रवादी पुस्तक इनसे हैं हम की लोकप्रियता शिक्षकों में भी बढ़ रही है। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ अवधेश कुमार अवध द्वारा इक्यावन लेखकों के सह लेखन में लिखित इक्यावन प्रतिनिधि पूर्वजों की शौर्यगाथा है इनसे हैं हम। यह पुस्तक श्याम प्रकाशन, जयपुर से […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

पूर्वोत्तर भारत में आध्यात्मिक सूर्योदय के अग्रदूत थे स्वामी विवेकानन्द

स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते। जी हाँ, राजा की पूजा उसके देश में होती है वो भी भय से इसके विपरीत विद्वान् की पूजा दुनिया भर में होती है वो भी पूरी श्रद्धा से। उन्नीसवीं शताब्दी का अंत और बीसवीं शताब्दी की शुरुआत एक ऐसे परिवेश में हुई जिसमें अधिकांश दुनिया परतन्त्र थी। न […]

सामाजिक

सोनपुर का मेला

सोनपुर का मेला जो कभी आजादी की योजना-स्थल के रूप में जाना जाता था, अब से आवाज दबाने के रूप में जाना जाएगा। जब कभी रिजनीति लड़खड़ाती है तो साहित्य आगे बढ़कर उसे थाम लेता है, वाला युग समाप्त हो रहा है। अब तो दोनों लड़खड़ा रहे हैं और दोनों एक-दूसरे से गुत्थम गुत्थ कर […]

कविता

हम भेड़ हैं

हाँ, हम भेड़ हैं हमारी संख्या भी बहुत अधिक है सोचना-विचारना भी हमारे वश में नहीं न अतीत का दुःख न भविष्य की चिंता बस वर्तमान में संतुष्ट क्रियाशील, लगनशील, अनुगामी अगुआ के अंध फॉलोवर अंध भक्त, अंध विश्वासी अनासक्त संन्यासी क्योंकि हम भेड़ हैं। हाँ, हम भेड़ हैं किंतु खोज रहे हैं उस भेड़िये […]

पुस्तक समीक्षा

वीरेन्द्र परमार की पुस्तकों में धड़कता है समग्र पूर्वोत्तर

पूर्वोत्तर भारत का कण-कण जिनकी उपस्थिति का भान कराता है वे हैं दृष्टि, संवेदना और कलम के धनी श्री वीरेन्द्र परमार जी। मुजफ्फरपुर बिहार में पल- बढ़-पढ़कर करतब दिखलाने आ गए पूर्वोत्तर भारत में और सरकारी सेवानिवृत्ति के उपरान्त फरीदाबाद में जा बसे। इनकी गिनती ऐसे चंद लेखकों में की जा सकती है जिनकी पुस्तकों […]

कविता

गीता विजय उद्घोष

कृष्ण की गीता पुरानी हो गई है, या कि लोगों की समझ कमजोर है। शस्त्र एवं शास्त्र दोनों हैं जरूरी, धर्म सम्मत कर्म से शुभ भोर है।। था करोड़ों सैन्य बल, पर पार्थ में परिजनों के हेतु भय या मोह था। कृष्ण को आना पड़ा गीता सुनाने, सोचिए कि क्या सबल व्यामोह था! वह महाभारत […]

सामाजिक

हमें अपने बच्चे ख़ुद सम्हालने होंगे

हम किसी पर अपनी मामूली सम्पत्ति तक नहीं छोड़ते और अनमोल बच्चे छोड़ देते हैं। है न आश्चर्यजनक! लेकिन सच यही है और इसका दुष्परिणाम भी हमारे समक्ष है। आज के कलयुगी दौर में सभी कुछ इतना मिलावटी, पाखंडयुक्त व खोखला है कि किसी पर आसानी से विश्वास करना संभव नहीं रहा है। समाज आज […]

हास्य व्यंग्य

ऊँची दुकान-फीका पकवान

दुकान और पकवान दोनों मानव से जुड़ी अति प्राचीन काल से सतत चलने वाली आवश्यकताएँ हैं। दुकान पर माँग – पूर्ति द्वारा कई तरह के पकवान खरीदे जा सकते हैं। पकवान द्वारा उदरभरण के साथ-साथ रसना भी तृप्ति के कई सोपान तय करती है। प्रायः यही धारणा बलवती पायी जाती है कि ऊँची दुकान हो […]

सामाजिक

कल्पना को कल्पना ही रहने दो

कल्पना हकीकत से अधिक आकर्षक होती है। कल्पना हकीकत से अधिक दुखदायी भी होती है। कल्पना चूँकि कल्पना है, हकीकत नहीं, इसलिए हकीकत से अधिक प्रभावशाली होती है, बहुत असरकारक होती है। तह पता होते हुए भी कि यह मात्र कल्पना है, फिर भी हर्ष या विषाद की गंगा बहाने में सक्षम होती है। हम […]

गीत/नवगीत

दिवा स्वप्न दिखलाने वाले

सूरज को झुठलाने वाले जुगनू बन इठलाने वाले सुन, नन्हें तारों की महफ़िल से यह दुनिया बहुत बड़ी है सूरज-ऊष्मा से अभिसिंचित अनुप्राणित अभिप्रेरित धरती श्रद्धा शील संकुचित मन से हाथ जोड़कर विनत खड़ी है मुँह पर लघुता-कम्बल डाले। तू धरती का नन्हा कण है क्षणभंगुर निर्बल बिन जड़ है तेरी अंँजुरी से यह चंदा […]