उपमान हमारे लज्जित हैं
हे रूपसि! तुझको देख-देख, उपमान हमारे लज्जित हैं।
तेरी आंखों में है जादू, दिल डूब – डूब है बेकाबू
नवरस प्रतिबिंबित नयन-सिंधु, माथे बिंदिया ज्यों चन्द्रबिन्दु
बालों को मेघ कहूं कैसे? बौने उपमान गहूं कैसे?
अब तुम्हीं बता दे कामायनि! प्रतिमान हमारे लज्जित हैं।
रस भरे होंठ लह-लह ललाम, कुंडल करते नथ को सलाम
अनजुठी, अनछुई, अलसाई, ज्यों घनानंद की कविताई
तुम सत्यवती, तुम शकुंतले, ये रूप – राशि रति देख जले
किससे तुलना मैं करूं,कहो? अरमान हमारे लज्जित हैं।
चंदा जैसे दोनों कपोल, लखकर शर्मिंदा है खगोल
हिरनी – सी चंचल सजग चाल, दमके सिंदूरी उच्च भाल
ग्रीवा सुडौल मखमली बाहु, ग्रस सका न कोई केतु – राहु
हे निर्मल निश्छल निर्विकारि, रसखान हमारे लज्जित हैं।
नव कदली पर कटि- कुच प्रदेश, छवि पर निसार वैकुंठ देश
विधि ने रच डाले छवि अनूप, जग में अपूर्व मधुकलश रूप
सुरसरि रसना से झरे नेह, तुम हो रति देवी – सी सदेह
तुम हो केवल तुम ही समान, गुणवान हमारे लज्जित हैं।
— डॉ अवधेश कुमार अवध
