गीत/नवगीत

उपमान हमारे लज्जित हैं

हे रूपसि! तुझको देख-देख, उपमान हमारे लज्जित हैं।

तेरी आंखों में है जादू, दिल डूब – डूब है बेकाबू
नवरस प्रतिबिंबित नयन-सिंधु, माथे बिंदिया ज्यों चन्द्रबिन्दु
बालों को मेघ कहूं कैसे? बौने उपमान गहूं कैसे?
अब तुम्हीं बता दे कामायनि! प्रतिमान हमारे लज्जित हैं।

रस भरे होंठ लह-लह ललाम, कुंडल करते नथ को सलाम
अनजुठी, अनछुई, अलसाई, ज्यों घनानंद की कविताई
तुम सत्यवती, तुम शकुंतले, ये रूप – राशि रति देख जले
किससे तुलना मैं करूं,कहो? अरमान हमारे लज्जित हैं।

चंदा जैसे दोनों कपोल, लखकर शर्मिंदा है खगोल
हिरनी – सी चंचल सजग चाल, दमके सिंदूरी उच्च भाल
ग्रीवा सुडौल मखमली बाहु, ग्रस सका न कोई केतु – राहु
हे निर्मल निश्छल निर्विकारि, रसखान हमारे लज्जित हैं।

नव कदली पर कटि- कुच प्रदेश, छवि पर निसार वैकुंठ देश
विधि ने रच डाले छवि अनूप, जग में अपूर्व मधुकलश रूप
सुरसरि रसना से झरे नेह, तुम हो रति देवी – सी सदेह
तुम हो केवल तुम ही समान, गुणवान हमारे लज्जित हैं।

— डॉ अवधेश कुमार अवध

*डॉ. अवधेश कुमार अवध

नाम- डॉ अवधेश कुमार ‘अवध’ पिता- स्व0 शिव कुमार सिंह जन्मतिथि- 15/01/1974 पता- ग्राम व पोस्ट : मैढ़ी जिला- चन्दौली (उ. प्र.) सम्पर्क नं. 919862744237 Awadhesh.gvil@gmail.com शिक्षा- स्नातकोत्तर: हिन्दी, अर्थशास्त्र बी. टेक. सिविल इंजीनियरिंग, बी. एड. डिप्लोमा: पत्रकारिता, इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग व्यवसाय- इंजीनियरिंग (मेघालय) प्रभारी- नारासणी साहित्य अकादमी, मेघालय सदस्य-पूर्वोत्तर हिन्दी साहित्य अकादमी प्रकाशन विवरण- विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन नियमित काव्य स्तम्भ- मासिक पत्र ‘निष्ठा’ अभिरुचि- साहित्य पाठ व सृजन