मुक्तक
लड़ रही है वह अकेले छुप – छुपाकर आप से।
कह नहीं सकती है कुछ भी भाइयों से बाप से।
एक विरहन की व्यथा को कौन समझेगा यहां-
जल रही जो रात- दिन जलते बदन के ताप से।।
— अवध
लड़ रही है वह अकेले छुप – छुपाकर आप से।
कह नहीं सकती है कुछ भी भाइयों से बाप से।
एक विरहन की व्यथा को कौन समझेगा यहां-
जल रही जो रात- दिन जलते बदन के ताप से।।
— अवध