किताब और पन्नों की खुशबू
एक समय था जब हाथों में होती किताब,
उसे पढ़ने को परिवारजन हो जाते बेताब।
वो दादा-दादी,नाना-नानी की अलमारियाँ,
किताबों से सजी खूब भरी रहती प्यारियां।
ये पुस्तकें नहीं हैं सिर्फ ज्ञान का ही भंडार,
अथाह समुन्दर सी गहराइयों के आरपार।
पढ़-पढ़कर पन्नों की खुशबू से होता प्यार,
चरित्र गढ़ती किताबों पे हमें होता ऐतबार।
ये हमें देती धैर्य, शक्ति, एकाग्रता व गहराई,
सोचने-समझने की आदत सिखते तनहाई।
पुस्तकों से होता भावनात्मक जुड़ाव सुलभ,
कागज़ की किताब पे लिखे शब्द हैं दुर्लभ।
— संजय एम तराणेकर
