लघुकथा

लघु कथा : वेशकीमती चावल

“उफ !! फिर ये राशन के मोटे चावल, नहीं खाने मुझे “बेटी ने कहा “मुझे भी नहीं खाने “बेटे ने भी हाँ में हाँ मिला दी. मैं सोच रही थी कि मासूमों को कैसे समझाऊं कि पति के कमरे से आवाज़ आई “मैडम आप परेशान न हों, मैं बच्चों को समझा दूंगा ” ये आवाज़ […]

मुक्तक/दोहा

कुछ मुक्तक

(1) जीवन की आड़ी तिरछी राहों पर आगे बढ़ता चल बाधा से घबराना कैसा सोच समझ पग धरता चल जन काँटों को चुन एक तरफ कर समतल कर दे राहों को दुःखी हृदय में प्रेम जगा कर मुस्कानों से भरता चल (2) सुजला सुफला शस्य श्यामला सपनों में ही शेष रह गया बहुत किया दोहन […]

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

रातों को चाँद सितारों से कहते हम अपने अफसाने पलकों की ठंडी सेजों पर जो स्वप्न सजाये अनजाने होंठों से बाहर आ न सकी छिप गईं हृदय के कोने में उसके- मेरे मन की बातें, या मैं जानूं या वो जाने कुछ ना बोले वो सकुचाए, हम भी थे थोड़े घबराये मुस्काते नयनों की भाषा […]

लघुकथा

लघु कथा : सूखा पेड़

दरवाजे पर दस्तक हुई. “कौन आया होगा — अभी तो सुबह भी नहीं हुई ” आँखें मलते हुए चादर हटा कर उठी. दरवाजा खोला. “अरे यह क्या, कोई भी नहीं ” बंद करने ही लगी थी कि फिर दस्तक हुई  एक काँपता हुआ हाथ आगे बढ़ा- “बेटी, एक रोटी मिलेगी ?” गौर से देखा, 70-72 वर्ष के एक बुजुर्ग सामने खड़े थे. मांगने के तरीके […]

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

कब से तुम्हे निहार रही हूँ नयन उठाकर देखो तो, मै खारा समुद्र पी जाऊं प्राण अगर तुम हँस दो तो आओ सेतु रचें पलकों से जो टूटे मन को जोडे, अश्रु-बिंदु की जलधारा है,इसको अँजुरी में लो तो प्रीति छुपी मन के भीतर जो, तुमसे मैं बतला न सकी प्यासे अधरों की भाषा को […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

ज़िन्दगी में नित नये अब राग गुंजाने लगे नित नये रंगों में नूतन स्वप्न हर्षाने लगे भर दुपहरी कूजती कोयल फुदकती डाल पर ज़िन्दगी को गुलमुहर के फूल अब भाने लगे खिलखिला कर हँस रहे हैं लाल-लाल अँगार से हर धड़कते हृदय को ये शीत पहुँचाने लगे जेठ की तपती दुपहरी में ये कैसे झूमते, […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हमसे पूछा न गया उनसे बताया न गया प्यार मन में ही रहा, होठों पे लाया न गया लट एक झटके से पलकों पे गिराली लेकिन आँख का मोती मगर हमसे छिपाया न गया चाँदनी रात में हमने जो लिखे ख़त उनको उन लिफाफों कोकभी उनको दिखाया न गया आशियाँ दिल में सजाया था जिनकी […]

मुक्तक/दोहा

कुछ मुक्तक

पुण्य हो गए शून्य मात जगदंबा बोली बढ़ गया पापाचार कि देखो धरती डोली उजड़ गया घर बार, मिला सब कुछ धरती में गये काल के गर्त मेरे सारे हमजोली   हमसे पूछा न गया उनसे बताया न गया प्यार मन में ही रहा ,होठों पर लाया न गया लट एक झटके से पलकों पे […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

रातों को चाँद सितारों से कहते हम अपने अफसाने पलकों की ठंडी सेजों पर जो स्वप्न सजाये अनजाने होंठों से बाहर आ न सकी छिप गईं हृदय के कोने में तेरे मेरे मन की बातें या तो मैं जानूं या तू जाने — लता यादव

मुक्तक/दोहा

मुक्तक : भाव हमारे चित्र तुम्हारे

भाव हमारे चित्र तुम्हारे दोनों एकाकार हो गए शब्दों की माला में गुँथ कर नीलकंठ का हार होगए शिल्पी ने पाषाणों पर शिवशक्ति जीवन्त किये अभिषेकित हो जल धारा से स्वप्न सभी साकार होगए उछलती झूमती नदी कितनी इठलाती है वक्ष पर पत्थर के शिव शिव लिख जाती है अचरज से मानव अवाक रह जाता […]