कविता

नवतपा


मृगतृष्णा की नदी
बह रही हैं
पिघली हुई सी
सड़के गयी हैं बहक
अमराई से आ रही हैं
पके हुऐ आमों की महक

कोयल की कूक से
गूंज उठता हैं
दोपहर का एकाँत अचानक

बरखा के इंतज़ार में
एकाकी जंगल
मील के पत्थरों सा
गया हैं ठीठक

सूखी पत्तियों की नसों में
जेठ की आंच
रही है धीरे धीरे सुलग

यादों के शहर में
भींगे हुए बादलों सी
दिखाई दे जाती हैं
तुम्हारी
उड़ती हुई एक झलक

मन मसोस कर रह जाता हूँ
कहाँ पाता हूँ तुम्हारे
सतरँगी आँचल के छोर को
मैं पकड़
मृगतृष्णा की नदी
बह रही हैं
पिघली हुई सी
सड़के गयी हैं बहक

किशोर

किशोर कुमार खोरेंद्र

परिचय - किशोर कुमार खोरेन्द्र जन्म तारीख -०७-१०-१९५४ शिक्षा - बी ए व्यवसाय - भारतीय स्टेट बैंक से सेवा निवृत एक अधिकारी रूचि- भ्रमण करना ,दोस्त बनाना , काव्य लेखन उपलब्धियाँ - बालार्क नामक कविता संग्रह का सह संपादन और विभिन्न काव्य संकलन की पुस्तकों में कविताओं को शामिल किया गया है add - t-58 sect- 01 extn awanti vihar RAIPUR ,C.G.

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