कविता

गजल सुनाती है रात

पांवो मे घुंघरू बाँध कर नाचती है रात

आवारा सड़कों  पर ..
बदनाम गलियों में  …
रात भर भटकती है रात
आकाश ओढ़ी  हुई  …धरती की
सोयी …आँखों का सपना बनकर.
जागती है रात
अनपढ़ और जवान लड़कियों को ..
.किस तरह छलता है शहर
देह के बाजार मे …अपना चेहरा तलाशती है रात
प्लेटफार्म पर बैठी हुई  नव-वधु सी उंघती है रात …
जंगल के एकांत मे पगडंडियों पर टहलती हुई
कोई कविता  गुनगुनाती है रात
बेरोजगार पांवो के इंतजार मे …
दरवाजे पर बैठी हुई माँ की तरह ….
इंतजार करती है रात
मुंह छुपाते  हुऐ  शहर को एक् बार …
फिर  नग्न करने के लिए  ..
सूरज के आने का इंतजार करती है रात
 
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

किशोर कुमार खोरेंद्र

परिचय - किशोर कुमार खोरेन्द्र जन्म तारीख -०७-१०-१९५४ शिक्षा - बी ए व्यवसाय - भारतीय स्टेट बैंक से सेवा निवृत एक अधिकारी रूचि- भ्रमण करना ,दोस्त बनाना , काव्य लेखन उपलब्धियाँ - बालार्क नामक कविता संग्रह का सह संपादन और विभिन्न काव्य संकलन की पुस्तकों में कविताओं को शामिल किया गया है add - t-58 sect- 01 extn awanti vihar RAIPUR ,C.G.

One thought on “गजल सुनाती है रात

  • जवाहर लाल सिंह

    रात को एक नए नजरिये से एक कवि ही देख सकता है … उपयुक्त चित्रण!

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