सूप पर हंसने लगी है चलनी
पीढ़ा चढ़कर ऊँचा बन रहे
आत्मप्रशंसा आप ही कर रहे
झांक रहे औरों के घर मेें
नहीं देखते अपनी करनी
सूप पर हंसने ………..
किसी को अहंकारवश छोड़ रहे
किसी को मजबूरी मेें जोड़ रहे
सांप छछूंदर सा हाल हुआ
तब हुआ कलेजा छलनी
सूप पर हंसने…………………
गजब की मौकापरस्ती है
कैसी कलुषित कूटनीति है
जाति धर्म मेें बांट रहे हैं
बांट रहे घर धरणी
सूप पर हंसने………………….
चालाकियां चाल चले हैं
सब जन अब सब समझ रहे हैं
सीख कर चालाकी कहते
जस करनी तस भरनी
सूप पर………………..
© Kiran singh

बहुत करारी कविता !
आभार
बहुत अच्छी कविता है .
आभार