मुक्तक/दोहा

खुशियों की चाभी

मेरी खुशियों की चाभी कहीं खो गयी
मेरी किस्मत भी जाने क्यों सो गयी
मेरे सपनों को ऐसे बिखरते देखकर
मेरी लेखनी भी देखो आज रो गयी
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अपनी भी जिंदगी में आयेगा खुशियाँ एकदिन
मेहनत के आगे कुछ नहीं है नामुमकिन
वक्त जितना भी बदल दे रास्ता खुशी का
अपने हिस्से की खुशियाँ तकदीर से लेंगे छीन
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– दीपिका कुमारी दीप्ति

दीपिका कुमारी दीप्ति

मैं दीपिका दीप्ति हूँ बैजनाथ यादव की नंदनी, मध्य वर्ग में जन्मी हूँ माँ है विन्ध्यावाशनी, पटना की निवासी हूँ पी.जी. की विधार्थी। लेखनी को मैंने बनाया अपना साथी ।। दीप जैसा जलकर तमस मिटाने का अरमान है, ईमानदारी और खुद्दारी ही अपनी पहचान है, चरित्र मेरी पूंजी है रचनाएँ मेरी थाती। लेखनी को मैंने बनाया अपना साथी।। दिल की बात स्याही में समेटती मेरी कलम, शब्दों का श्रृंगार कर बनाती है दुल्हन, तमन्ना है लेखनी मेरी पाये जग में ख्याति । लेखनी को मैंने बनाया अपना साथी ।।

4 thoughts on “खुशियों की चाभी

  • वैभव दुबे "विशेष"

    लगन ही मंजिल तक पहुँचने का एक मात्र रास्ता है।

  • अखिलेश पाण्डेय

    आप अपना काम करती जाइए , निराश ना होइए समय का पहिया जिस दिन आपकी तरफ मुड़े गा उस दिन हर जगह आपका ही आपका नाम गूंजे गा..

  • विभा रानी श्रीवास्तव

    वाह
    जे बात

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