संस्मरण

मेरी कहानी 106

सुबह का नाश्ता ले कर मैं क्लीवलैंड रोड बस डैपो की ओर चल पड़ा। यूं तो इंडिया जाने से पहले मैं पार्क लेन डैपो में काम करता था लेकिन हैड ऑफिस क्लीवलैंड रोड डैपो में ही होता था। मैनेजर अभी भी मिस्टर कैंडल ही था लेकिन वोह अभी आया नहीं था। इस लिए मैं मैस रूम में चले गिया और उस में बैठे बस ड्राइवरों और कंडक्टरों से बातें करने लगा। सभी मुझे जानते थे ,कुछ नए भी थे। कुछ देर बाद मैंने मिस्टर कैंडल को गाड़ी पार्क करते हुए देखा। कुछ गाड़ियों के लिए पार्किंग प्लेस मिस्टर कैंडल के दफ्तर के सामने ही थी।

दस पंदरा मिनट मैंने और इंतज़ार किया और फिर दफ्तर की डोर बैल कर दी ,प्लीज़ कम इन सुन कर मैं दफ्तर में चले गिया। प्लीज़ हैव ए सीट सुन कर मैं कुर्सी पर मिस्टर कैंडल के सामने बैठ गिया। हाऊ कैन आई हैल्प यू सुन कर मैंने वोह लैटर निकाला जो मिस्टर कैंडल ने इंडिया जाने से पहले मुझे भेजा था। मैंने वैसे भी बोल दिया कि अब मैं दुबारा काम पे आना चाहता था। मिस्टर कैंडल ने लैटर देख कर कुछ फाइलें देखीं और बोला ,” मिस्टर बामरा ! सॉरी अभी यहां कोई वेकेंसी नहीं है लेकिन अगर तुम वालसाल टाऊन की गेरेज से काम करना चाहो तो मैं उन को टेलीफून करके पूछ लेता हूँ “.

यह मेरे लिए बहुत मुश्किल था क्योंकि वालसाल टाऊन एक तो दस किलोमीटर दूर था, दूसरे बहुत दफा ऐसी ड्यूटी होती थी कि सुबह तीन वजे घर से जाना पड़ता था और जब सर्दिओं के दिनों में बर्फ़ें पड़ती थीं तो ट्रैवल करना और भी मुश्किल हो सकता था। फिर भी एक मिनट मैंने सोचा कि चलो देखा जाएगा और मैंने मिस्टर कैंडल को हाँ बोल दिया कि वोह वालसाल गेरेज में पता कर लें। मिस्टर कैंडल ने वालसाल के मैनेजर से एक दो मिनट बातें की और मेरा नाम और एड्रेस उस को बता दिया। कुछ देर बाद उन्होंने टेलीफून रख दिया और मुझे कहा कि मैं नैक्स्ट मंडे को वालसाल बस स्टेशन पर मैनेजर मिस्टर डिकन्सन को रिपोर्ट करूँ।

मैं दफ्तर से बाहर निकला और टाऊन में घूमता हुआ घर आ गिया। काम तो मुझे मिल गिया लेकिन अब मुझे गाड़ी की जरुरत थी क्योंकि इस के बगैर काम पर जाना मुश्किल था। अभी कुछ दिन रहते थे ,इस लिए मैंने गाड़ीआं देखने शुरू कर दी। EXPRESS & STAR शाम के पेपर के तीन एडिशन निकलते थे और इस के बुधवार दिन के फाइनल एडीशन में कारों की ऐड बहुत होती थी और उस दिन बुधवार ही था। शाम को एक पेपर शॉप से मैंने पेपर लिया और गाड़ीआं देखने लगा। एक गाडी HILMAN HUNTER मेरे मन को भा गई जिस की माइलेज बहुत कम थी और वैरी गुड कंडीशन लिखा हुआ था। मैंने उसी वक्त फोन किया।

आगे एक अँगरेज़ बोल रहा था। मैंने उस से सारी डिटेल पूछी ,उस की सर्विस हिस्टरी ,कोई एक्सीडेंट ,कितने पहले ओनर्ज़, MOT कब तक ,रोड टैक्स कब तक ,टायरों की हालत और गाड़ी का रंग बगैरा। उस ने सब कुछ बताया कि गाड़ी उस ने नई ही ली थी और वोह ही अकेला ओनर था ,और मैंने उसे उस का एड्रेस पूछा। एड्रेस चार पांच मील दूर का ही था जो वारस्टोन एरिए की वारस्टोन रोड पर ही था। मैंने गोरे को शाम को आने के लिए बोल दिया। मैंने उसी वक्त कुलवंत के फुफड़ जी सुरजीत सिंह को टेलीफून किया ( अब वोह इस दुनिआ में नहीं हैं ). वोह घर पर ही थे और उन्होंने बोल दिया कि वोह शाम को आ जाएंगे।

कुछ बातें फुफड़ सुरजीत सिंह के बारे में नहीं लिखूंगा तो मेरी कहानी का एक बहुत बड़ा भाग कट्ट जाएगा। कुलवंत के दादा जी कई भाई थे और उन भाईओं से ही कुलवंत की भुआ थी ,जिस का नाम रतनी है लेकिन उस को रत्ती बोलते हैं। भूआ की शादी बहुत देर पहले सुरजीत सिंह से हुई थी और वोह धैनोवाली छोड़ कर अपने ससुराल सुरजीत सिंह के घर और फिर इंगलैंड आ गई थी। कुलवंत बुआ रतनी को कुछ कुछ ही जानती थी क्योंकि जब भुआ रतनी की शादी हुई थी तो उस वक्त कुलवंत बहुत छोटी थी ।

जब कुलवंत शादी के बाद इंग्लैण्ड आई तो एक दिन बर्मिंघम की सौहो रोड पर हम शॉपिंग कर रहे थे। कुलवंत की नज़र बुआ रत्ती पर पडी तो वोह उसे पहचान गई और उसी वक्त उस की ओर चल पड़ी ,एक दो मिनट में ही सब को ऐसा महसूस हुआ जैसे बिछुड़े परिवार मिल गए हैं। बस वोह दिन और आज ,हमारा रिश्ता सगों से कहीं ज़्यादा है। बहुत बातें तो मैं बाद में लिखूंगा ,लेकिन फिलहाल कुछ कुछ फुफड़ सुरजीत सिंह के बारे में लिखूंगा।

सुरजीत सिंह मुझ से दस साल बड़ा था, रिश्तेदारी तो थी ही लेकिन दोस्ती इतनी थी कि हमारी एक दूसरे की जान में जान थी। मैं उन को कैसे हो फुफड़ा कह कर बुलाया करता था। हम एक दूसरे से बीस किलोमीटर दूर ही रहते थे लेकिन शायद ही कोई वीकएंड ऐसा हो कि हम ना मिले हों। मेरे काम की शिफ्टें बहुत अजीब होती थीं और लोगों से हट्ट कर होती थी। इस लिए फुफड़ का टेलीफून आ जाता ,” गुरमेल ! कौन सी शिफ्ट है तेरी ,मिलने को जी चाहता है”. मैं अपनी शिफ्ट बता के कह देता ,” इतने वजे आ जाना फुफड़ा “. बुआ फुफड़ के तीन बच्चे हैं ,जिन्दी ,निंदी और एक लड़की सुरिंदर। सभी आ जाते और घर में रौनक हो जाती। इसी तरह कभी हम उन के घर चले जाते। जैसे ही हमारे बच्चे सुनते कि हम ने निंदी के घर जाना है वोह खुश हो जाते।

बाद में मेरा दोस्त बहादर भी इस दोस्ती में शामल हो गिया था और जब हम तीनों इकठे पब्ब में जाते तो पब्ब बंद होने तक गप्पें हांकते रहते। पब्ब में और दोस्त भी बहुत होते थे और किसी को बातें करने का चांस मुश्किल से मिलता था। हर कोई कहता था ,” पहले मेरी बात सुनों “. यह महफल ऐसी होती थी कि इस में हर टॉपिक पे चर्चा होती थी और टॉपिक कभी भी खत्म नहीं होते थे । पब्ब में जरूरी नहीं कि सभी बियर पीने ही जाते थे। कुछ राधा सुआमी धर्म को मानने वाले भी होते थे जो कोक या कोई जुइस ले लेते ,बात तो सिर्फ लुत्फ़ उठाने की ही होती थी क्योंकि उस समय पब्ब या क्लब्ब ही मीटिंग प्लेस होती थी। आज यह बहुत कम हो गिया है।

भुआ फुफड़ की बातें तो होती रहेंगी ,फिलहाल मैं उसी बात पर आता हूँ। शाम को फुफड़ सुरजीत सिंह आ गिया और हम वारस्टोन रोड को चल पड़े। अँगरेज़ के घर की डोर बैल हम ने की तो वोह बाहर आ गिया। मैंने गाड़ी के बारे में पुछा तो वोह चाबी लेने भीतर चला गिया। आते ही उस ने गैरेज से कार निकाली। देखते ही हमें पसंद आ गई। फिर उस ने गाड़ी के बौनेट को ऊपर उठाया और इंजिन ऑन कर दिया। इंजिन की आवाज़ से लगता था कि गाड़ी वैल मेनटेंड थी। मैंने उसे चला कर देखने को बोला तो उस ने नो प्राब्लम बोला, हम तीनों गाड़ी में बैठ गए मैं गाड़ी चलाने लगा। टाऊन से बाहर हम खुली सड़क पर आ गए। चलाने में गाड़ी बहुत मज़ेदार महसूस हो रही थी। पंदरा बीस मिनट ड्राइव करके हम वापस आ गए।

मैंने गाड़ी खड़ी कर दी और हम गाड़ी का पेंट वर्क देखने लगे कि ठीक ठाक है या नहीं। गाड़ी के पीछे मैंने बहुत ही छोटा सा निशान देखा यहां पेंट उतरा हुआ था। मैंने गोरे को दिखाया तो वोह बोला कि वोह पचीस पाउंड कीमत कम कर लेगा। हमारा सौदा हो गिया और मैंने पचास पाउंड डिपॉज़िट दे दिया और रसीद ले कर हम घर आ गए। सुरजीत सिंह खाना खा कर वापस चले गिया और मैंने उसे बोल दिया कि दूसरे दिन गाड़ी मैं खुद ही ले आऊंगा। दूसरे दिन मैंने बैंक से पैसे लिए और बस पकड़ कर उस गोरे को पैसे दे दिए और फिर सारे डाकुमेंट ले कर टाऊन को आ गिया। टाउन आ कर पहले गाड़ी की इंश्योरेंस करवाई और कवर नोट ले कर फिर गोरे के घर गिया और गाड़ी ले कर मैं अपने घर आ गिया।

गाड़ी देखते ही बच्चे खुश हो गए। मैं कुलवंत और बच्चों को गाड़ी में बिठा कर बाहर ले गिया। गाड़ी ले कर ऐसा लग रहा था जैसे कोई साथी मिल गिया हो ,हम आज़ाद हो गए हों, एक घुटन से निजात मिल गई हो। अब कुछ दिन हमारे पास थे घूमने फिरने के लिए। एक दिन हम बहादर के घर चले गए और खूब मज़े किये। एक दिन हम भुआ फुफड़ के घर चले गए। तब भुआ फुफड़ दोनों एक ही फैक्ट्री में काम करते थे और अच्छे पैसे कमा लेते थे। उन दिनों भुआ जी बहुत सुन्दर दिखाई देती थी ,एक आकर्षण था उनमें। उन के सभी बच्चे खुद ही स्कूल को आ जा सकते थे ,इस लिए उन दोनों को काम करने में कोई बाधा नहीं थी। देर रात तक हम बैठे रहे और फिर वापस आ गए।

सोमवार को सुबह मैं 9 वजे वालसाल बस स्टेशन पर मैनेजर मिस्टर डिकन्सन के दफ्तर में जा पहुंचा। डिकन्सन ने कुछ सवाल पूछे जो मेरे लिए कोई नए नहीं थे। कुछ देर बाद उस ने मुझे एक लैटर दिया कि मैं गैरेज में पहुँच कर सीनियर इंस्पैक्टर को रिपोर्ट करूँ। वालसाल टाऊन की मुझे इतनी वाकफियत नहीं थी सिर्फ एक दो दफा ही मैं यहां आया था। मैंने बस पकड़ी और कंडक्टर को बता दिया कि वोह मुझे गैरेज पर उतार दे जो ब्लॉक्सविच रोड पर थी । दस मिनट में ही मैं गैरेज जा पहुंचा। सीनियर इंस्पैक्टर ने गैरेज की क्लब्ब में ही मिलना था जो गैरेज के अंदर ही थी।

जब मैं गैरेज की क्लब्ब के अंदर गिया तो मैं यह देख कर खुश हो गिया कि मेरी तरह ही दो और लड़के जो क्लीवलैंड रोड गैरेज में ही काम करते थे वहां बैठे थे। वोह भी मुझे देख कर खुश हो गए। उन में एक था ,मोहन लाल कंडा और दूसरा पाकिस्तानी था ,जिस को खान ही कहते थे और पूरा नाम मुझे पहले भी पता नहीं था क्योंकि उसे सभी खान कह कर ही बुलाते थे। हैलो हैलो के बाद ,तुम कैसे आये ,तुम कैसे आये ,कहने लगे। पता चला कि वोह भी मेरी तरह ही आये हुए थे। मोहन लाल भी इंडिया गिया हुआ था और आने पर उसे भी मेरी तरह वालसाल भेजा गिया था और खान भी ऐसे ही था। उन को देख मिल कर मुझे बहुत हौसला हुआ और उन के चेहरे भी खिले हुए थे।

कुछ देर बाद सीनियर इंस्पैक्टर आ गिया ,जिस के हाथ में एक टिकट मशीन कुछ टाइम टेबल की किताबें ,फेयर लिस्ट की किताबें एक और बड़ा सा टिकट रोल था। आते ही उस ने हैलो बोला और हमारे पास बैठ गिया। बहुत बातें तो अब भूल गई हैं लेकिन कुछ कुछ साराँश याद है। उस ने कहा था कि क्योंकि हम पहले ही WMPTE में काम कर चुक्के हैं ,सिर्फ टिकट मशीन ही इलग्ग टाइप की है। इतने साल ड्राइविंग का काम करके अब हम को फिर से ए बी सी पड़नी पढ़ रही थी क्योंकि अब फिर से हमें कंडक्टर का काम करना था।

जो टिकट मशीन वुल्वरहैम्पटन में होती थी उस में कई टिकट रोल पड़ते थे लेकिन जो मशीन हम ने अब इस्तेमाल करनी थी ,उस में सिर्फ एक ही बड़ा रोल पड़ता था। इस को समझना तो कोई मुश्किल नहीं था ,सिर्फ प्रैक्टिस की ही जरुरत थी क्योंकि रश टाइम में टिकट बिजली की तेजी से इशू करने पड़ते थे और एक नई बात इस में यह थी कि हर सटेज जो दो तीन स्टॉप के बाद आ जाती थी ,उस वक्त मशीन के क्लोजिंग नंबर लिखने पड़ते थे जब कि पहले हम सिर्फ बस टर्मिनस पर ही क्लोज़ करते थे। मशीन के ऊपर एक डायल था। कोई टिकट इशू करना होता था तो पहले डायल को घुमा कर टिकट की वैलयु ,छै पैनी या दस पैनी ,जो भी हो डालनी होती थी और फिर साइड पर लगे एक हैंडल का एक राउंड सर्कल देना होता था ,जिस से टिकट प्रिंट हो कर बाहर आ जाता था और उसे फाड़ कर यात्री को दे दिया जाता था और साथ ही उस से पैसे लेकर कोई चेंज हो तो देनी पड़ती थी।

इंस्पैक्टर ने हमें रूटों के बारे में समझाया कि उस गैरेज में कितने रुट ऑपरेट होते थे और कितनी स्कूल की बसें थीं जो इलग्ग से सुबह शाम सिर्फ स्कूल के बच्चों को ही ले कर जाती आती थी। हम हैरान हो गए कि इस गैरेज में रुट वुल्वरहैम्पटन से कहीं ज़्यादा थे और बहुत दूर दूर तक जाते थे। यही कारण था कि पहले कंडक्टर ही बनना पड़ता था ताकि सभी रूटों की जानकारी हो जाए और रुट सीखने के लिए कई महीने लग जाते थे। सीनियर इंस्पैक्टर बहुत फ्रैंडली था और बताता था कि उस का डैड इंडिया में मिलिटरी ऑफिसर होता था। बहुत देर तक वोह हमें समझाता रहा और फिर उस ने हमें बता दिया कि कल से हमें ट्रेनिंग पे जाना होगा ताकि मशीन और काम की जानकारी हो जाए। सुबह आने को बोल वोह उठ खड़ा हुआ और कहा कि अगर हम ने बियर पीनी हो तो यहां गैरेज की क्लब्ब में सस्ते रेट पर मिलती है।

uबाई बाई कह कर वोह चले गिया और हम बियर पीने और बातें करने लगे। अपने देश जाने के कारण हम एक दूसरे को बताने लगे। एक बात बताना चाहूंगा कि यूं तो मुसलमानों में शराब की मनाही है लेकिन यहां कुछ एक को छोड़ कर सभी पीते थे और कुछ तो बहुत ही पीते थे लेकिन एक बात थी कि सभी पाकिस्तानी और इंडियन लड़कों में दोस्ती बहुत होती थी और एक दूसरे की हर मुश्किल में मदद करते थे। कुछ देर बाद हम उठ खड़े हुए और अपने घरों को जाने के लिए बस की इंतज़ार करने लगे जो गैरेज के पास से ही जाती थी। चलता . . . . . . . . .

 

10 thoughts on “मेरी कहानी 106

  • विजय कुमार सिंघल

    भाईसाहब आपको अपनी जीवंतता का सुपरिणाम मिला। आप हर चुनौती को स्वीकार करने को तैयार रहते थे यही आपकी सफलता का मंत्र था।

    • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

      धन्यवाद विजय भाई .

  • Man Mohan Kumar Arya

    आपने कार खरीदी और आपको नई नौकरी मिल गई, यह दोनों बातें महत्वपूर्ण लग रहीं हैं। भुआ व फूफा जी का परिचय पढ़कर भी अच्छा लगा। पूरी कथा मनोरंजक है और शुरू से अंत तक इसमें दिलचस्पी बनी रहती है। हार्दिक धन्यवाद एवं नमस्ते आदरणीय श्री गुरमेल सिंह जी।

    • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

      मनमोहन भाई , धन्यवाद . दरअसल हर एक इंसान की अपनी अपनी कहानी होती है और बहुत बातें अक्सर हम भूल जाते हैं लेकिन जब उन को इकठे करना शुरू कर देते हैं तो खुद को ही हैरानी होने लगती है और पड़ने में अपने आप को ही अच्छा लगने लगता है . अन्य लोग भी पड़ें तो मज़ा दुगना हो जाता है .

      • विजय कुमार सिंघल

        सही कहा भाई साहब आपने। मैं अपनी आत्मकथा पढ़ता हूँ तो फ़िल्म देखने जैसा आनंद आता है।

        • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

          धन्यवाद विजय भाई .आप सब लोगों के कॉमेंट से बहुत हौसला मिलता है . एक बात और भी है कि मुझे हिंदी लिखने की कुछ कुछ मुहारत हासल हो गई .

      • Man Mohan Kumar Arya

        आपने जो कहा वह सत्य है। ऐसा अनेक बार हमारे व सभी के साथ होता है। धन्यवाद।

  • Man Mohan Kumar Arya

    आपने कार खरीदी और आपको नई नौकरी मिल गई, यह दोनों बातें महत्वपूर्ण लग रहीं हैं। भुआ व फूफा जी का परिचय पढ़कर भी अच्छा लगा। पूरी कथा मनोरंजक है और शुरू से अंत तक इसमें दिलचस्पी बनी रहती है। हार्दिक धन्यवाद एवं नमस्ते आदरणीय श्री गुरमेल सिंह जी।

  • लीला तिवानी

    प्रिय गुरमैल भाई जी, इस एपीसोड को पढ़कर तो हमें सुप्रसिद्ध उपन्यास-कहानी लेखक विमल मित्र के लेखन की रोचक शैली याद आ गई. शत्रुघ्न का अपनी जीवनी के बारे में कहना है- ”मेरी जीवनी मनोरंजक और प्रभावशाली है, क्योंकि इसमें अच्छी बुरी हर तरह की चीजें हैं और इसमें नकारात्मक पहलू को भी ईमानदारी से बताया गया है; मेरा मानना है कि मेरी जीवनी सच्ची और पारदर्शी है।” यह जीवनी एक महिला लेखिका प्रधान ने लिखी है. आपकी आत्मकथा भी वैसी ही बन पड़ी है. असीम आभार.

    • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

      लीला बहन, यही कारण था कि पहले बहुत दफा कोशिश करने के बावजूद मैं जीवनी लिखने में कामयाब नहीं हो सका था किओंकि बात इसी चीज़ पर आ कर रुक जाती थी कि सच्चाई लिखना बहुत मुश्किल बात होती है .यही मन में रहता है कि कोई गुस्सा ना कर ले या पता नहीं इस को कैसे ले .अभी भी मैं बहुत कुछ नहीं लिख रहा हूँ किओंकि इस में रिश्तों में दरार आ सकती है ,फिर भी 95 % लिख रहा हूँ . शत्रुघ्न सिन्हा की जीवनी महला लेखिका परधान जी ने जो लिखी है उस की सैरेमनी मैंने एबीपी पे देखि थी ,जिस में अमिताबचन ,शत्रुघ्न सिन्हा जी की पत्नी और बेटी भी थी और अमिताबचन जी उन की पुरानी बातों को ले कर हंस रहे थे . शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी हंस रही थी कि उन की जीवन कहानी पढ़ कर उसे लगा कि उस ने गलत आदमी से शादी कर ली है .

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