ग़ज़ल
तेरे महलों के ठीक पीछे ही,
हमने इक झोंपड़ी बना ली है
सूना है घर ईमानदारी का,
रोज़ बेईमान की दिवाली है
चाँद पर है अमीरी का कब्जा,
हम गरीबों की रात काली है
जे.पी., लोहिया के देश में अब तो,
नेता कहना भी एक गाली है
अनाज गोदाम में चूहे खा गए,
अनाथ बच्चों का पेट खाली है
मेरी थाली में एक रोटी थी,
वो भी महँगाई ने चुरा ली है
रक्षा करनी थी जिसको नारी की,
वही तो कर रहा दलाली है
शहीद की लाश पर खड़े होकर,
राह संवाद की निकाली है
हरेक हमले के बाद हमने भी,
कड़ी चेतावनी दे डाली है
कैसे फूलेगी देश की बगिया,
इसका दुश्मन ही इसका माली है
चारा, कोयला खा के इन्होंने,
दौलत देश की पचा ली है
अपनी बर्बादी की गज़ल मैंने,
खुद ही लिखी है, खुद ही गा ली है।
— भरत मल्होत्रा

वाह वाह ! सुन्दर ग़ज़ल !!