गीत/नवगीत

गीत : ढाका में क़त्लेआम

(रमजान के पाक महीने में ढाका में हुए कत्लेआम पर दहशतगर्दों की सोच को दिखाती मेरी कविता)

क़त्ल, धमाके खून खराबा
खुला हुआ दहशत का ढाबा
ढाका में अल्लाह के बन्दे,
सुना गए ये ही पैगाम
जय इस्लाम, जय इस्लाम

करके अगवा आलम सारा,
सबको पूछ पूछ के मारा
जो कुरान को पढ़ ना पाया,
उसका हो गया काम तमाम
जय इस्लाम, जय इस्लाम

कपडे पहने काले काले,
दीन धरम के हैं रखवाले
लाशों के अम्बार लगा दो,
पाक महीना है रमजान
जय इस्लाम जय इस्लाम,

क़ुरबानी की बात अमल में,
छुरी दबाये रहो बगल में
जोर से बोलो अल्ला अकबर,
बकरा काटो, या इंसान
जय इस्लाम, जय इस्लाम,

बच्चे-बूढ़े, औरत मारो,
मासूमो के शीश उतारो
जन्नत में हूरों के संग में,
हमको करना है आराम
जय इस्लाम, जय इस्लाम,
सारी दुनिया दहलायेंगे,
राज खलीफा का लाएंगे
ईद मनाकर सारे मुस्लिम,
मौन रहेंगे सुबहो शाम
जय इस्लाम, जय इस्लाम

——कवि गौरव चौहान

One thought on “गीत : ढाका में क़त्लेआम

  • विभा रानी श्रीवास्तव

    उम्दा लेखन ….. शर्मनाक घटना

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