कहानी

“रुबिया”

रुबिया के आँखों में आंसू रुकने के नाम नहीं ले रहे थे। हबस-हबस कर रोये जा रही थी और आंसुओं की धार को अपने दुपट्टे में समेटते जा रही थी। कोई चारा भी तो नहीं था, अपना घर होता तो अबतक कइयों की पुचकार से अघा गई होती। कइयों के कंधे का सहारा मिल गया होता, और उसके आंसू अकेले के मोहताज न होते। पर यहाँ इस छात्रालय की अकेली कोठरी में दीवारों के अलावां उसका कौन था। जो अपना था जिसको वह नादानी में सब कुछ सौंपकर सुखी अरमानों का सपना देख रही थी वही उसके उछलते हुए अरमानों का गला घोंट गया था।
निहायत अल्हण किस्म की गाँव की रहने वाली रुबिया, अपने माँ-बाप की इकलौती संतान है। बड़े ही प्यार से मनोहर ने इसे अपना बेटा समझकर पाला है। खुद शिक्षक होने के नाते, शिक्षा का मूल्य बखूबी समझते थे। रुबिया की माँ भी पढ़ी लिखी महिला हैं। 20 वर्ष पहले जब रुबिया का जन्म आपरेशन से हुआ तो डाकटर ने बताया कि पेट में गाँठ है जिसको निकालना पड़ेगा और साथ ही बच्चेदानी भी निकालनी पड़ेगी, अन्यथा जान का जोखिम है। यह सुनकर मनोहर भाई अर्धविक्षिप्त से हो गए और मजबूरी में ऑपरेशन के लिए यह मानकर सहमत हो गए कि यही बच्ची मेरे लिए बेटा और बेटी दोनों है। पति पत्नी दोनों ने उसे खूब ढंग से पढ़ाया लिखाया और रुबिया का दाखिला मेरिट बेस पर डाक्टरी में हो गया। गाँव घर के लिए बहुत बड़ी बात थी माँ-बाप की खुशियों का कोई पारावार न था। तमाम खुशियाँ परिवार के झोले में एक साथ आ गई जिसे लेकर वह बड़े शहर के बड़े कालेज में बड़े ही उत्साह के साथ दाखिल हुई।
सब कुछ बदला हुआ सा लगा, गाँव के परिवेष में पली हुई रुबिया को। कुछ दिन तो गुमसुम सी कमरे से स्कूल तक सिमित हो गई थी पर धीरे-धीरे अन्य बच्चियों के संपर्क में आई और दिन अपने गति से गुजरने लगा। अपनी जबाबदारी से वाकिफ रुबिया का पूरा ध्यान पढने में केंद्रित होता था और वह अपने उन्नत पथ पर मसगूल हो गई थी। उसकी लगन और सादगी से कालेज में उसकी प्रसंशा होने लगी थी। रुबिया खूबसूरत तो थी ही, गाने बजाने में भी कम न थी। कालेज के लडके उसके तरफ आकर्षित होने लगे तो लड़कियां कुछेक उससे जलन भी करने लगी, गाँव के गंवारपन व पुराने विचार रहन सहन पर फप्तियाँ भी कसने लगी। रुबिया लड़कों से बहुत कम बात करती थी, शायद उसे यह पसंद नहीं था। उसका यह फैसला आज के समय के अनुकूल न होने से, कई मौके पर बेवजह उसको तानों से गुजरना पड़ता था। जिससे साथ की सहेलियां उससे कटने लगी और रुबिया फिर अकेली हो गई। अकेलापन उसको खलने लगा, उसपर कुछ उम्र कुछ दिखावा दोनों का असर हुआ और वह लड़कों से बेहिचक मिलने के अवसर तलासने लगी, इसी दौरान वह गिरीश को अपने बहुत नजदीक पाई जो उससे सीनियर था और वह भी गाँव का ही रहने वाला था। धीरे धीरे रुबिया गिरीश के आगोश में समाती गई और उससे दिखावे में ही सही, मर्यादा का उलंघन हो गया। बहुत पश्चाताप भी हुआ उसको पर क्या करती, अपने ही नज़रों में गिर गई। उसने गिरीश से शादी के वादे को पूरा करने पर दबाव बढ़ाया तो उसे पता चला कि गिरीश किसी से प्रेम करता है और उससे ही शादी करना चाहता है।
ठगी हुई रुबिया मन मसोस कर रह गई और अपने नादानी को अपने पेट में लिए हुए अपने गांव वापस गई। मनोहर भाई को दूसरा बड़ा झटका लगा और परिवार पूरी तरह से टूट गया। कुछ दिनों बाद वह फिर कालेज में गई और अपने मुसीबत के भार से किसी तरह मुक्त हो गई। धीरे-धीरे पुरानी बातों को दफ़न करके वह अपने लक्ष्य पर चलने लगी। आज वह एक कुशल डाकटर बनकर अपने गाँव पंहुची है जिससे मनोहर भाई की आशा जिवंत हो गई है और गांव जिसे रुबिया के बारे में उसके बचपने के अलावां कुछ भी नहीं पता है, खुश होकर गले से लगा लिया। मनोहर भाई अपनी पुस्तैनी जमीन पर एक अस्पताल बनवाने का फैसला किया और रुबिया का नाम इलाके में रोशन हो गया। लोगों को एक कुशल डॉक्टर मिल गया तो रुबिया को इज्जत का मुकाम। माँ- बाप ने बहुत समझाया पर शादी के लिए राजी न होने वाली रुबिया अपनी मर्जी के दृश्य को याद करके काँप गई और आज माँ के आगे हार गई। डॉ. नरेश जो उसके अस्पताल के एक अच्छे डाकटर हैं उनको अपने जीवन साथी के रूप में वरण कर लिया। मनोहर भाई उसके इस फैसले से अति प्रसन्न हैं रुबिया के साथ ही साथ उनका भी घर जो बस गया। रुबिया भी खुश है कि वह एक महिला डॉकटर है और महिलाओं के साथ ही साथ वह पुरुषों का इलाज कर रही है। दुःख केवल इतना है कि वह अपने उस बच्चे के साथ न्याय नहीं कर पाई जो उसके एक भूल का गवाह था, अब वह किसी को ऐसा नहीं करने देती है और कई अनाथ बच्चों को भरपूर मदद करती है जिसे वह अपना प्रायश्चित समझती है।
महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

*महातम मिश्र

शीर्षक- महातम मिश्रा के मन की आवाज जन्म तारीख- नौ दिसंबर उन्नीस सौ अट्ठावन जन्म भूमी- ग्राम- भरसी, गोरखपुर, उ.प्र. हाल- अहमदाबाद में भारत सरकार में सेवारत हूँ