कविता

“गरीबी”

गरीबी

एक शूल की तरह

पली बढ़ी

चढ़ती गई व प्राण हरती गई

उतरी तो धमनियों से रक्त निचोड़ गई

जब सुस्त हुई तो

तगड़े व स्वस्थ नौजवान को भी पस्त कर गई

गरीबी गरीब कर गई॥

गरीबी

लता की तरह बढ़ी

उपजाऊँ जमीन पर उगी

पर किसी दरख्त तक न पहुँच पाई

जमीन पर फैली

उसे हरी करती रही

पैरों की ठोकर खा-खाकर

कुरमुरा कर जीती रही॥

वक्त बेवक्त की सेल्फी बन गई

गरीबी गरीब कर गई॥

महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

*महातम मिश्र

शीर्षक- महातम मिश्रा के मन की आवाज जन्म तारीख- नौ दिसंबर उन्नीस सौ अट्ठावन जन्म भूमी- ग्राम- भरसी, गोरखपुर, उ.प्र. हाल- अहमदाबाद में भारत सरकार में सेवारत हूँ