गीत/नवगीत

गीत

(कश्मीर में मस्जिद के बाहर मुसलमानों की भीड़ द्वारा मारे गए निर्दोष DSP अयूब जी की शहादत पर दिल से निकली एक कविता)

कश्मीर में आतंक का सामान नहीं हूँ,
अच्छा हुआ काफिर हूँ, मुसलमान नहीं हूँ ||

1-होता जो मुसलमान,शर्मसार ही होता,
औरों के साथ मैं भी गुनहगार ही होता,

बलवे सड़क पे रोज़ सुबह शाम ही होते,
पत्थर ही मेरे हाथ में इस्लाम के होते,

इस मुल्क से अलगाव की पहचान नहीं हूँ,
अच्छा हुआ काफ़िर हूँ, मुसलमान नहीं हूँ ||

2-होता जो मुसलमान, अमन चैन मिटाता,
रमजान के महिने में भी हथियार उठाता,

मस्जिद में अता करके नमाज़े में निकलता,
फिर भीड़ में भारत के लिए ज़हर उगलता,

दहशत का कोई मज़हबी अरमान नहीं हूँ,
अच्छा हुआ काफिर हूँ, मुसलमान नहीं हूँ ||

3-होता जो मुसलमान तो फितरत मैं दिखाता,
भारत की हार पर मैं पटाखे भी चलाता,

बजने पे राष्ट्रगान में होता नहीं खड़ा,
मज़हब को दिखाता मैं अपने मुल्क से बड़ा,

गद्दार रिवायत का खानदान नहीं हूँ,
अच्छा हुआ काफ़िर हूँ,मुसलमान नहीं हूँ ||

4-होता जो मुसलमान, तो होता यही किस्सा
इक शख्स को कुचलती हुयी भीड़ का हिस्सा

मस्जिद के सामने ही खुलेआम ये करता
मासूमियत को क़त्ल मैं करने से न डरता

बिन मूंछ दाढ़ियों का कदरदान नहीं हूँ,
अच्छा हुआ काफिर हूँ मुसलमान नहीं हूँ,

5-होता जो मुसलमान, अपना धर्म निभाता
भारत में रहके गीत पाकिस्तान के गाता

इस्लाम की बुलंदियों का दौर चलाता
होते ही जवां हाथ में बन्दूक उठाता

“गौरव” हूँ कोई बेहूदा बुरहान नहीं हूँ
अच्छा हुआ काफ़िर हूँ, मुसलमान नहीं हूँ ||

— गौरव चौहान