राजनीति

लेख– मूलभूत सुविधाएं पहुँचनी चाहिए अंतिम व्यक्ति तक!

कहे कबीरा निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। आज के परिवेश से यह उक्ति मेल नहीं खाती। फ़िर वह बात किसी भी स्तर से की जाएं। वह बात सामाजिक जीवन की हो, या राजनीतिक गलियारों की। अब स्थिति ऐसी निर्मित होती जा रहीं, कि जो दल अवाम के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में पालनहार बनकर पांच वर्ष के लिए बैठता है। वह भी अपनी कमियों को सुनना नहीं चाहता। इतना ही नहीं यह कमी हर दल में आती जा रहीं, फ़िर वह वर्तमान सरकार हो, या पूर्ववर्ती सरकारें। आज सभी दल का मुख्य उद्देश्य सिर्फ़ सत्ताधीश बनने की जुगत तक सीमित हो रहा, वह बड़ी विचित्र स्थिति है। सरकार का काम अवाम को बेहतर सुविधाएं मुहैया करना होता है, न कि हर समय राजनीति करना। आज आधुनिक भारत में जब आने वाले भविष्य के कर्णधार बच्चें भूखे सोने को विवश हैं। इतना ही नहीं जीने के लिए आवश्यक भोजन, पानी और हवा है। तीनों चीजें समुचित रूप से समाज के अंतिम पंक्ति में बैठे व्यक्ति को आज़ादी के सात दशक से अधिक का समय बीतने के बाद भी नहीं मिल पाया है, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य लोकतांत्रिक व्यवस्था का कोई ओर हो नहीं सकता। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में हम लगातार पिछड़ रहें, शायद उसकी फ़िक्र हमारी व्यवस्था को नहीं, लेकिन अगर कोई बढ़ाई रहनुमाई तन्त्र की आज के दौर में कोई संस्था कर देती है। तो उसका व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार होता है। आख़िर दोहरे स्तर की यह राजनीति क्यों? हर समय किए गए रहनुमाई कार्यों का प्रचार ही ज़रूरी नहीं। पहली प्राथमिकता जन-जन तक खाद्यान्न सुरक्षा के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को पहुँचाने के लिए व्यापक स्तर पर योजनाएं बनानी चाहिए।

वैसे भी जिस दौर में डिजिटल इंडिया घर-घर के मुहाने पर पहुँचने को हो, उस परिवेश में  देश के भीतर से अंधविश्वास नहीं छूट पा रहा हैं। देशवासी अगर वर्तमान में भी सामाजिक कुरीतियों के बन्धन में बन्धे हैं। जो कि देश के समक्ष  अज्ञानता, जातिवाद, धर्म , आरक्षण, और गरीबी को नहीं पीछे छोड़ सका हैं, फिर कैसे आज़ाद हुए हैं? क्या मात्र रहनुमाओं की पोथी में, उनके ख्याली विचारों में, चुनाव के रणभूमि में आज़ाद हुई हैं, देश की आवाम। विश्व का कोई देश हो जब तक देश के  लिए आज़ादी का सोपन अधूरा हैं, जब तक नागरिकों को उनका पूर्ण अधिकार न प्राप्त हो जाएं। फ़िर ऐसे में हम देशवासी आज गरीब की जद में जकड़े हुए हैं, देश की कुल संपत्ति का 58 फीसद हिस्सा , अगर दस बीस हथेलियों तक सिमटकर रह गया हैं। फिर देश में किस स्वत्रंतता, समानता,और आज़ादी की बात होती हैं। यह समझ से परे हैं।

  अगर वास्तव में हमारी रहनुमाई व्यवस्था हमें आज़ाद पंछी होने का अहसास दिलाना चाहती, तो वह वोट बैंक के नाम पर आज तक जातिवादी बेड़ियों में बांधकर नहीं रखती। देश के सियासतदानों की इच्छा अगर देश में समानता, स्वत्रंतता का बीज बोने की होती, तो वह चुनावी दौर में सीटों का बंटवारा जाति-धर्म का समीकरण देखकर नहीं करते, साथ में हमारे रहनुमा हम देश वासियों से अन्य मुद्दों पर भी अलग मालूमात होते हैं। उस और भी कदम हमारी सरकारें उठाती। देश में सियासतदां और आम नागरिकों की जीवनशैली में जमीं- आसमां का फ़र्क़ हैं। सरकारों को उसको दूर करना चाहिए। अगर सियासतदारों को जनता के समक्ष लाना ही हैं, तो संसद की कैंटीन को त्यागों, मुफ्त यात्रा सुविधाओं को खत्म करो। सुरक्षा तंत्र पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, उसको तिलांजलि दे, सियासतदां अगर उस पैसे को देश की गरीब, भुखमरी, कुपोषण जैसी समस्याओं पर लगा दें, तो उससे देश मे कुछ सकारात्मक माहौल पैदा हो सकता हैं।

आज देश में अगर धर्म-जाति और संप्रदायवाद की राजनीति हावी हो रही हैं, फिर कैसी आज़ादी का जिक्र हम कर रहें हैं? उस आज़ादी को जिसे देश की सामाजिक व्यवस्था तिलांजलि नहीं दे सकी। जातिवादी कुप्रथा को, गरीबीयत को, आरक्षण को, जो वर्तमान में समाज में क्लेश का कारण बन हुआ हैं। देश मे अगर भीमराव अंबेडकर द्वारा प्रदत्त आरक्षण की प्रति दस वर्ष पर समीक्षा नहीं हो रहीं, तो उसके जिम्मेदार भी रहनुमा व्यवस्था हैं, क्योंकि वे वोटबैंक से ऊपर उठने की जहमत नहीं कर सकें हैं। ऐसे में कैसी आज़ादी की पिपहरी हम बजा रहें हैं।  हम वर्तमान डिजिटल इंडिया के दौर में क्यों इतना सहनशील हो गये हैं कि कायरता की सीमा कब लांघ जाते हैं, इसका एहसास भी नहीं कर पाते? समाज में क्रूरतापूर्ण व्यहवार करने वाले को तिलांजलि नहीं दे पाते। आपराधिकरण का सत्ता में लय हो जाता हैं। फिर हम किस परिवेश की ओर झुक रहें हैं, इसका अनुभव क्यों नहीं करते? देश में आखिर स्वच्छ राजनीति की केवल आवश्यकता महसूस की जाती रहेंगी। उसके लिए बाट क्यों नहीं कोई पार्टी जोह पा रहीं हैं। यह हमारे देश की व्यवस्था की कमजोरी हैं, कि शिक्षा को लेकर केवल आगामी लक्ष्य निर्धारित किये जाते हैं, लेकिन पूर्ण नहीं हो पाती।

क्यों हमारे देश के शिक्षित एवं योग्य युवा विदेश जाने को मजबूर होते हैं, इसका जवाब हमारी रहनुमाई व्यवस्था क्यों नहीं ढूढ़ती? जो युवा देश के भविष्य के कर्णधार हैं, उनके पलायन करने के कारण पर कब बहस होगी ? ऐसा तंत्र क्यों नहीं बन पा रहा हैं, कि देश- प्रदेश की प्रतिभा अपने स्थानीय स्तर के काम आ सके। अब देश की व्यवस्था को जरूर इन विषयों पर गौर करना होगा। इसके साथ देश मे उस व्यवस्था के क्या लाभ जो कुपोषण, और शिक्षा प्रणाली में आवश्यक सुधार नहीं कर पा रही हैं। यह आज़ाद देश के समक्ष कलंक हैं, कि देश में पांचवीं और आठवीं के बच्चे अपने निचली दर्ज़े की किताब नहीं पढ़ पाते। इससे अच्छा तो देश आज़ादी के पूर्व था, जब देश में अंग्रेजों ने अंग्रेजियत पैदा करने के लिए शिक्षा में सुधार करने पर आमादा थे। देश में अगर कुपोषण, बेरोजगारी और सामाजिक अभद्रता का बोलबाला बढ़ता जा रहा हैं। फिर सरकारों को विचार करना चाहिए, कि वे देश की आवाम को किस तरीके की आज़ादी दे रहीं हैं।

महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896