नितांत अकेले
दूर तक पसरी हुई रास्ते
गुमसुम चुपचाप
चौक चौराहे
सुस्त सुस्त
चल रही गाड़ियां
शांत कदम शांत पल!
बारिशों की एक झड़ी में
बूंदाबांदी हुआ करते थे
उल्लासी उन्मुक्त
उत्तेजक मदमस्त
और,
घूमते थे एक जोड़ी
चुपचाप गुमसुम
कोहनी से कोहनी
टकराते हुए!
चलते थे सड़क के
इस छोर से उस छोर तक
इस किनारे से
उस किनारे तक
मौन स्पर्श!
मौन मुस्कान!!
मौन संवाद!!!
और, अभी,,
यह बारिशों की झड़ी
अकेले हैं
नितांत अकेले!
— मनोज शाह मानस
