लघुकथा

ज़िद्दी बीज

दीप्ती ने अपनी दादी के मेकअप को अंतिम टच देकर कहा।

“वॉओ…दादी…यू आर गोइंग टू रॉक इट..”
सपना ने भी खुद को आईने में देखा तो सोलह साल की वह सपना दिखी जिसका स्टेज पर जाने का ख्वाब अधूरा रह गया था। लेकिन आज पोती बासठ बरस की सपना की वह ख्वाहिश पूरा करने जा रही है। सोसाइटी के होली मिलन कार्यक्रम में वह अपना हुनर दिखाने वाली थीं।
कोई पंद्रह दिन पहले ही उन्होंने दीप्ती के सामने आह भरते हुए अपने अधूरे ख्वाब का ज़िक्र किया था। दीप्ती जो स्वयं नृत्य सीखती थी अपनी दादी की पीड़ा को अच्छी तरह समझ गई। बस उसने तय कर लिया कि दादी को हुनर दिखाने का मंच ज़रूर दिलाएगी।
दीप्ती की नज़र सोसाइटी में लगे बैनर पर पड़ी। सूचना थी कि जो होली मिलन कार्यक्रम में अपनी प्रतिभा दिखाना चाहें रजिस्ट्रेशन करवा लें। दीप्ती ने सपना का नाम लिखा दिया।
सपना को डर था कि इतनी जल्दी कैसे होगा। लेकिन दीप्ती एक अच्छी गुरू साबित हुईं। सपना की पसंदीदा हिरोइन वहीदा रहमान के गाने पर एक सुंदर परफार्मेंस तैयार करवा दी।
सपना कार्यक्रम में जाने के लिए निकलने लगीं तो बेटे ने सकुचाते हुए कहा।
“मम्मी वैसे तो आप जो चाहें करने के लिए आज़ाद हैं। पर इस उम्र में यह आवश्यक है क्या ?”
साथ खड़ी बहू कुछ ना बोल कर भी अपने पती की हाँ में हाँ मिला रही थी। सपना सोफे पर बैठ गई।
“हाँ बेटा आज मैं करूँगी तो वही जो चाहती हूँ। पर तुम एक बात पर सोंचना कि क्या सदैव अपनी इच्छाओं को दबाना ही मेरी मर्यादा है। स्टेज पर जाने की इस इच्छा को मैंने दिल की गहराई में दबा दिया था। पर वह आज भी मरी नहीं है। एक ज़िद्दी बीज की तरह अंकुरित होना चाहती है। और आज मैं उसे नहीं दबाऊँगी।”
सपना पूरे आत्मविश्वास के साथ अपना हुनर दिखाने चली गई।

*आशीष कुमार त्रिवेदी

नाम :- आशीष कुमार त्रिवेदी पता :- C-2072 Indira nagar Lucknow -226016 मैं कहानी, लघु कथा, लेख लिखता हूँ. मेरी एक कहानी म. प्र, से प्रकाशित सत्य की मशाल पत्रिका में छपी है