धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

शाहपुराधीश की ऋषि दयानन्द से प्रथम भेंट और शंका समाधान

ओ३म्

शाहपुराधीश सर नाहरसिंह वम्र्मा जी (जन्म कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी सम्वत् 1912 विक्रमी एवं मृत्यु आषाढ़ कृष्णा 8, सम्वत् 1989 विक्रमी, जीवनकाल 77 वर्ष) ऋषि दयानन्द के प्रमुख विश्वसनीय शिष्यों में से एक थे। ऋषि दयानन्द कई बार उनके राज्य में गये, वहां रहे और उनको धर्म व राजनीति विषयक अपने उपदेशों से लाभान्वित किया। परोपकारिणी सभा की अनासागर के निकट जो ऋषि-उद्यान भूमि व परिसर है, वह भी नाहरसिंह जी ने परोपकारिणी सभा को दान में दिया था। यदि वह ऐसा न करते तो हम आज परोपकारिणी सभा का जो भव्य स्वरूप वा परिसर देखते हैं, वह न होता। ऋषि दयानन्द ने उदयपुर के अपने प्रवास में परोपकारिणी सभा का निर्माण किया था। उसकी प्रबन्ध समिति में नाहरसिंह जी को भी सम्मिलित किया था। नाहरसिंह जी व उनके पुत्र श्री सुदर्शनदेव (मृत्यु 9 फरवरी सन् 1991 ई.) भी आजीवन आर्यसमाज से जुड़े रहे। वह अपने सभी धार्मिक कृत्य वैदिक रीति से ही करते थे।

इस लेख के माध्यम से हम शाहपुराधीश सर नाहरसिंह वम्र्मा जी की महर्षि दयानन्द के साथ चित्तौड़ में हुई प्रथम भेंट का वर्णन कर रहे हैं। इस भेंट में नाहरसिंह जी ने ऋषि के सम्मुख एक शंका उपस्थित की थी जिसका उन्होंने सन्तोषजनक उत्तर दिया था। हमसे भी कुछ बन्धुओं ने यह शंका की है। अब हम अपने इस शंका को करने वाले मित्रों को वही उत्तर दे सकते हैं जो ऋषि ने नाहरसिंह जी को दिया था।

भेंट का विवरण इस प्रकार है। चित्तौड़ की वीर भूमि में राजाधिराज का स्वामी दयानन्द से प्रथम साक्षात्कार हुआ। विक्रमी सम्वत् 1881 में चित्तौड़ से खण्डवा की रेल लाइन का उद्घाटन करने के लिये तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड रिपन का आगमन हुआ था। इसमें उदयपुराधीश महाराणा सज्जनसिंह अपने सामन्तों सहित उपस्थित हुए थे। एक बहुत बड़े आयोजन का समाचार पाकर स्वामी दयानन्द भी चित्तौड़ आये और गम्भीरी नदी के तट पर स्थित रुण्डेश्वर महादेव के मन्दिर में डेरा डाला। वहां उनके उपदेश भी होते थे जिनमें राजाधिराज प्रायः आते थे। स्वामी जी से अपनी प्रथम भेंट का वर्णन स्वंय नाहरसिंहजी ने मथुरा मे आयोजित दयानन्द जन्म शताब्दी के अवसर पर निम्न प्रकार किया–‘‘स्वामी दयानन्द से प्रथम बार चित्तौड़ में भेंट हुई। मेरा ख्याल था कि मेरी शंका का समाधान स्वामीजी ही कर सकते हैं। वस्तुतः उनकी सेवा में शंकायें प्रकट करने पर उन्होंने उचित समाधान कर दिया। मैंने पूछा था कि ब्रह्माजी अपनी बेटी विद्या से फंस गये। इसका अभिप्राय स्वामीजी ने यह बतलाया कि विद्या ब्रह्मा की बेटी है और वह विद्या में अर्थात् पठन पाठन में लीन हो गये। इस समाधान से मेरी (राजाधिराज नाहरसिंह जी की) स्वामी जी में श्रद्धा हो गई।”

हम आशा करते हैं कि पाठक इस प्रसंग वा घटना से लाभान्वित होंगे। ओ३म् शम्।

मनमोहन कुमार आर्य