शब्द गढ़ती रहूँगी
उमड़ते घुमड़ते रहे
बादल अंतस में
नीर बन बह ना सके
नैनों से
फिर मेरी कविता
चूक गई उस तक
पहुंचते पहुंचते
हज़ारों योजन पथ
चलकर भी
उसके हो ना सके
हो सकता है
मेरे शब्दों में
सामर्थ्य नही उतना
या तुम्हारी
सम्पन्नता को
मेराअस्तित्व अस्वीकार्य हो
मेरे दो हाथ
निर्रथक प्रयास करते
तुम्हारी आकांक्षाओं के
नभ को छूने
हताश हो
क्लांत हो
धरा पर फिर
आसीन हो
जाती
तुम चाहो ना चाहो
गौरैया मेरे प्राणों की
छटपटाती रहेगी
तुम्हारी कठोरता के
आंगन में
शब्द में गढ़ती रहूंगी
सपनों की रेत पर
तुम भले ही मिटाते रहो
यथार्थ की लहर बनकर।
— सविता दास सवि
