कविता

ये जिंदगी

बनते बिगड़ते रिश्तों का लेखा जोखा है ये जिंदगी
रोज नये रिश्ते बनते और टूटते हैं
क्या यही है जिंदगी?

कभी धुप में रिश्तों की छाया देती है ये जिंदगी,
कभी खुशी कभी गम की बरसात देती है ये जिंदगी।
क्या यही है जिंदगी?

किसी पे आस किसी पे विश्वास है ये जिंदगी,
कभी किसी ने हंसाया तो कभी किसी ने रुलाया ।
क्या यही है जिंदगी?

कभी किसी के लिए सरताज है ये जिंदगी
कभी दो वक्त की रोटी को मोहताज है जिंदगी
कभी किसी के लिए बिंदास है ये जिंदगी
तो कभी किसी के लिए उदास है जिंदगी।
क्या यही है जिंदगी?

आओ हमसब मिलकर जिंदगी को एक नया आयाम दे,
नफरत और बदले की भावना को पूर्ण विराम दे।
खुशियों को बांटकर मुहब्बत का पैगाम दे,
जिंदगी को एक खुबसूरत सा नाम दे।

— मृदुल शरण