गज़ल
लब वतन गाते हंसी भी चेहरे अभी आने सी लगी
इक गजल लब पर आकर गुनगुनाने सी लगी |
रास्ते अनबने से चली इक नदी समन्दर सी लगी
ज़िन्दगी में रुकना बड़ी सज़ा ही बताने सी लगी |
टूटते पुरानी कड़ियों के वक्त बेगानगी दिखने लगी ,
सोचता मज़बूती की उम्मीद सबक सिखाने सी लगी |
होठ पर ज़र्द ख़ामोशी सजाकर रात लाने को बैठी,
हादसे में लगता नया रंग लाकर चरमराने सी लगी |
आ कभी अजमा ज़रा उन कहे शब्दों को जाने ,
माँ कही दुआ से सभी इक बद-दुआ गुनगुनाने सी लगी |
— रेखा मोहन
