श्याम जा बैठे मथुरा
काजल,बिन्दी,चूड़ी और गजरा,
श्रृंगार पे मेरे छाये बदरा।
क्यूँ देखूं आईना अब मैं?
श्याम तो मेरे जा बैठे मथुरा।
बाँध दी अखियाँ मेरी,
प्रेम के गुलजार से।
मुरझा सी गयी हूँ,
इस कृत्रिम श्रृंगार से।
श्रृंगार पे मेरे छाये बदरा।
क्यूँ देखूं आईना अब मैं?
श्याम तो मेरे जा बैठे मथुरा।
बाँध दी अखियाँ मेरी,
प्रेम के गुलजार से।
मुरझा सी गयी हूँ,
इस कृत्रिम श्रृंगार से।
गर तू न डाले नजर,
रोम रोम लगे बिखरा।
क्यूँ देखूं आईना अब मैं?
श्याम तो मेरे जा बैठे मथुरा।
अंग अंग पुकारे श्याम,
उर मे तेरा पहरा सा है।
फिजायें भी मौन है अब,
हर साज ठहरा सा है।।
गर यूँ बिसराना ही था,
रोग क्यूँ दिया ये गहरा?
क्यूँ देखूं आईना अब मैं?
श्याम तो मेरे जा बैठे मथुरा।
रोम रोम लगे बिखरा।
क्यूँ देखूं आईना अब मैं?
श्याम तो मेरे जा बैठे मथुरा।
अंग अंग पुकारे श्याम,
उर मे तेरा पहरा सा है।
फिजायें भी मौन है अब,
हर साज ठहरा सा है।।
गर यूँ बिसराना ही था,
रोग क्यूँ दिया ये गहरा?
क्यूँ देखूं आईना अब मैं?
श्याम तो मेरे जा बैठे मथुरा।
— चारु मितल
